क्‍या से क्‍या हो गया ... टीपू तेरे
क्‍या से क्‍या हो गया ... टीपू तेरे

क्‍या से क्‍या हो गया … टीपू तेरे प्‍यार में

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स
राजनीति में कोई किसी का नहीं होता है। समाजवादी पार्टी में जो कुछ हो रहा है उससे यह साबित हो गया। चाचा-भतीजा के बीच जारी खींचतान ने नेताजी को इन्सिक्‍योर कर दिया है। इतने जतन से नेताजी ने पार्टी बनाई और बेटे ने एक झटके में उन्‍हें बेदखल कर दिया। भाई और बेटे की लड़ाई ने उनकी साइकिल को भी चुनाव आयोग पहुंचा दिया।
अब बेचारे नेताजी साइकिल पकड़ कर बैठे हैं। इन्सिक्‍योरिटी इस कदर है कि साइकिल (चुनाव चिह्न) पर हक जताने के लिए वह इसी पर सवार होकर चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंच गए। कह रहे हैं पार्टी के अध्‍यक्ष हम हैं और साइकिल भी हमाई है। अकलेस (अखिलेश) हमाय नइ सुनते। बेटा कहता है किसी ने उनके कान में मंतर फूंक दिया है।
मुलायम अपनी बेदखली को भले ही अवैध बताएं, लेकिन उन्‍हें कुर्सी से उतारने का खुमार फिलहाल बेटे की आंखों से उतरता नहीं दिख रहा। सुना है साइकिल पर दावा ठोकने के लिए मुलायम के प्रोफेसर भाई रामगोपाल भी मंगलवार को चुनाव आयोग की परिक्रमा करने वाले हैं। पिता-पुत्र दोनों साइकिल पर दावा कर रहे हैं, लेकिन कहीं ऐसा न हो कि आयोग इसे जब्‍त (फ्रीज) कर ले और दोनों नए सिंबल थमा दे।
मुश्किल तो मतदाताओं की होने वाली है। उनकी सबसे बड़ी मुश्किल यह पहचानना होगी कि असली समाजवादी पार्टी कौन सी है? अगर असली-नकली की पहचान कर भी ली तो सबसे पहले उन्‍हें पार्टी का नया नाम याद करना पड़ेगा। इसके बाद ईवीएम में उन्‍हें साइकिल ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगा, क्‍योंकि इस पर मालिकाना हक का फैसला आसान नहीं है। कुल मिलाकर यह कि रायता अभी और फैलेगा।
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