'जिगर में बड़ी आग है' का मतलब समझते हैं?
'जिगर में बड़ी आग है' का मतलब समझते हैं?

‘जिगर में बड़ी आग है’ का मतलब समझते हैं?

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। सर्दी की बात पूस की अंधेरी रात के बिना अधूरी सी लगती है। ‘पूस की रात’ में मुंशी प्रेमचंद की कहानी का किरदार हलकू और उसका कुत्‍ता जबरा तो याद ही होगा कि कैसे दोनों जाड़े में ऐंठ रहे थे। पूस में तो वैसे भी आकाश में तारे ठिठुरते हुए मालूम पड़ते हैं। जमीन पर आदम और आदमजात की क्‍या बिसात!

आज हम हड्डियों से रगड़ खाने वाली ठंढ की उसी वि‍‍भीषिका पर आधारित एक गाने का भाव स्‍पष्‍ट करने जा रहे हैं। प्रस्‍तुत गीत महा पराक्रमी योद्धाओं पर आधारित चलचित्र ‘ओमकारा’ से उद्धृत है। इस गाने में दो योद्धा यह दर्शाना चाह रहे हैं कि वे ठंढ से बिलबिला रहे हैं, पर उनके हाव-भाव से साफ झलकता है कि वे दैहिक सुख के लिए छटपटा रहे हैं। एक अल्‍हड़ युवती से अपनी बदहवासी दूर करने को कह रहे हैं। सरदार से ज्‍यादा उनके चेले-चाटी गरमाहट की उम्‍मीद में लहरा रहे हैं। गाने की पृष्‍ठभूमि में एक गांव निशातगंज है।

न गिलाफ, न लिहाफ
ठंढी हवा भी खिलाफ ससुरी
इतनी सर्दी है,किसी का लिहाफ लई ले
जा पड़ोसी के चूल्‍हे से आग लई ले

उपर्युक्‍त पंक्तियों के माध्‍यम से रचयिता पूस की ठंढ से बिलबिलाते दो लंपट टाइप मित्रों की बेचैनी को व्‍यक्‍त कर रहा है। दोनों अपने चेले-चाटियों के साथ ऑर्केस्‍ट्रा देखने गए थे। लेकिन शायद वहां ठंढ बहुत थी। दोनों शरीर को बुरी तरह कंपकंपाते हुए आॅर्केस्‍ट्रा में आई नर्तकी से कह रहे हैं – अरे बाप रे! बहुत ठंढ है। कम्‍बल-रजाई भी नहीं है। ठंढी हवा से हड्डियां आपस में रगड़ खा रही हैं। हड्डियों का संगीत सुनाई पड़ रहा है। एक दोस्‍त बदहवासी में असंसदीय शब्‍दों का भी प्रयोग करता है और नृत्‍यांगना से कहता है कि प्रचण्‍ड ठंढ से कुल्‍फी जम रही है, किसी की की रजाई उठाकर ले आओ। रजाई न मिले तो पड़ोसी के चूल्‍हे से आग ही ले आना। घूरा जला के तापेंगे तो राहत मिलेगी।

बीड़ी जलाइले जिगर से पिया
जिगर मा बड़ी आग है
धुआं ना निकालियो लब से पिया
जे दुनिया बड़ी घाघ है

उनकी छटपटाहट देखकर नृत्‍यांगना को यह समझते देर नहीं लगती कि दोनों किस दर्जा छिछोरे हैं और किस फिराक में कंपकंपी बटोरे जा रहे हैं। फिर भी वह मजे लेने के लिए अपनी ओढ़नी फेंक कर उन्‍हें सौंदर्य बोध कराती है। दोनों की कंपकंपी भरी मिन्‍नतों पर कहती है- सजन रे मेरे जिगर में आग धधक रही है। तू इससे बीड़ी जला के पी ले। राहत मिलेगी। साथ ही, चेतावनी भरे लहजे में कहती है कि बीड़ी जलाकर तो पी लेना, लेकिन मुंह से धुआं मत निकलना। वरना सबको पता चल जाएगा कि मैं यहां हूं। ये दुनिया बहुत घाघ है, गंध से ही मेरी मौजूदगी ताड़ लेती है। लेकिन दोनों दोस्‍त वही रजाई और चूल्‍हे से आग की ही रट लगाए रखते हैं। उधर, सरदार को बदहवास देखकर उनके ढेरों चेले-चाटी कूद-फांद कर वातावरण में ऊष्‍णता लाने का भरसक प्रयास करते हैं, लेकिन कोई नतीजा निकलता नहीं दिखता है।

न कसूर, न फतूर
बिना जु़र्म के हज़ूर मर गए
हो मर गए

चोरवा के मन बसे ककड़ी के खेत में। दोनों दोस्‍तों की हालत भ्‍ाी कुछ ऐसी ही थी। वो बीड़ी पीने थोड़े न आए थे। उन्‍होंने तो पहले से ही आचमन (मदिरापान) कर रखा है। … वो तो दूसरी ही फिराक में थे। ठंढ तो बहाना था। वे तो ठंढ काटने का सामान जुटाने की फिराक में थे। इसलिए वह यह कहकर अपनी दीन अवस्‍था दिखाना चाहते थे कि हमने न तो कोई गलती की है और न ही कोई बखेड़ा-लफड़ा किया है। फिर भी मरे जा रहे हैं। इस ठंढ में हमारा बचना मुश्किल ही दिखता है।

ओ… ऐसे इक दिन दुपहरी बुलाए लियो रे
बांध घुंघरू कचहरी लगाए लियो रे

अब नर्तकी उनके मंसूबों को बढि़या से समझ चुकी है। वह ढांढ़स बंधाते हुए कहती है- ठीक है। किसी दिन दोपहर को मुझे बुला लेना। मैं अपने नृत्‍य से महफिल में रंग जमा दूंगी। यह संकेत भी देती है कि तुम लोगों को अगर वाकई ‘ठंढ’ लग रही है और मेरे अंदर इतनी आग है कि तुम अंगीठी जला सकते हो। बीडी जलाना तो मामूली बात है। यहां एक बात पूरी तरह स्‍पष्‍ट हो जाती है कि योद्धाओं से ठंढ अकेले काटा नहीं जा रहा है और नर्तकी भी अपने भीतर काम-वासना की अग्नि लिए घूम रही है।

न तो चक्‍कुओं की धार
न दरांती न कटार
ऐसा काटे की दांत का निशान छोड़ दे
ये कटाई तो कोई भी किसान छोड़ दे
ऐसे जालिम का छोड़ दे
मकान जोड़ दे रे बिल्‍लो

नृत्‍यांगना के इशारे से दोनों दोस्‍तों का हौसला बढ़ जाता है। वे ठंढ का सहारा लेकर अपनी असली भावनाएं उजागर करते हैं। कहते हैं- ये ठंढ इस तरह काट रही है कि इसे धारदार चाकू, दरांती और कटार की भी जरूरत नहीं है। इस तरह काट रही है कि दांत के निशान रह गए हों। ऐसी कटाई तो कोई किसान भी नहीं करता है। फिर वह अपनी हार्दिक इच्‍छा की अभिव्‍यक्ति कर ही देता है। ऑर्केस्‍ट्रा गर्ल से वह कहता है- बिल्‍लो मेरा घर बसा दो। जिसके साथ रहती हो उसे छोड़ दो। ये ऑर्केस्‍ट्रा-फार्केस्‍ट्रा में कुछ नहीं रखा है। तुम्‍हारे अंदर की ज्‍वाला को ये जालिम समझ ही नहीं सकते हैं।

न बुलाया, न बताया
माने नींद से जगाया, हाय रे
ऐसे चौंके ले हाथ में नसीब आ गया
वो इलायची खिलाई के करीब आ गया
कोयला जलाइले जिगर से पिया
जिगर मा बड़ी आग है

उसके अनुनय को सुनकर लगता है जैसे ऑर्केस्‍ट्रा गर्ल की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई। वह कहती है कि तुमने इस बारे में न तो कभी बताया और न ही मुझे अपने यहां बुलाया। हाय रे… तूने एक झटके में ही नींद से जगा दिया। तुम्‍हारे अनुनय से मैं तो चौंक गई हूं। ऐसा लगता है कि मेरी किस्‍मत अब मेरे हाथ में है। तुमने मुझ पर जादू कर दिया है। कुलमिलाकर उसे आग बुझाने और लंपटों के ठंढ काटने की व्‍यवस्‍था हो गई।

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