पता नहीं कौन फिरकी ले रहा है!
पता नहीं कौन फिरकी ले रहा है!

पता नहीं कौन फिरकी ले रहा है!

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। पिछले कुछ दिनों से मुझे अपनी औकात से बहुत ज्‍यादा बड़े मैसेज आ रहे हैं। हफ्ते में दो-तीन तो आ ही जाते हैं। मैसेज भेज कर मुझे BMW खरीदने के लिए उत्‍तेजित करने की कोशिश की जाती है। लिखा होता है, BMW के फलां मॉडल पर तीन लाख, फलां मॉडल पर चार लाख का डिस्‍काउंट मिल रहा है। पता नहीं कौन फिरकी लेता है।

सच कहूं तो BMW वाले मैसेज देखकर अंदर से खुशी महसूस होती है। नजर के सामने मनपसंद गहरे नीले रंग की BMW फर्राटे से दौड़ती दिखने लगती है। डाइवर गाड़ी भगा रहा है और मैं पिछली सीट पर पसर कर बैठा हुआ हूं। लेकिन अगले ही पल वही खुशी विकलांग और मनहूस लगने लगती है। अचानक गरीब ख्‍याल जेहन में उभरते हैं। तब सोचता हूं…मेरी औकात BMW की नहीं है, फिर ये कौन मैसेज भेजता है। मुझे ही क्‍यों भेजता है? बैरी किस जन्‍म का बदला ले रहा है मुझसे? तब हृदय से एक हूक उठती है- भले मानसो पत्रकार हूं, कुछ तो इज्जत रख लो!

कभी-कभी लगता है कि मेरे छँटे हुए कुछ दोस्‍तों में से कोई तफरी के लिए BMW के शोरूम में घुस गया होगा। BMW को छूकर ही अपने अरमान पूरे कर रहा होगा। मन भर गाड़ी को निहार कर वहां से निकल रहा होगा कि शोरूम के कर्मचारियों ने धर लिया होगा। तब उसने तरह-तरह के पैंतरे आजमाए होंगे। कहा होगा अभी जल्‍दी में हूं, एक बिजनेस मीटिंग है और अर्जेंटली पहुंचना है।

तब गाड़़ी बेचने पर आमादा कर्मचारी ने कहा होगा- सर… इसके और भी मॉडल हैं। एक-दो दिन में आने ही वाली है। लेकिन उसकी हड़बड़ाहट देखकर बोला होगा- आप अपना कार्ड दे दीजिये। नया मॉडल के आते ही हम आपको सूचित करेंगे। आदतन उस मित्र ने जेब टटोली होगी और यह कहकर पीछा छुड़ाया होगा कि कार्ड तो नहीं है। इसके बाद इंक्वायरी कर्मचारी ने नंबर ही छोड़ जाने की गुजारिश की होगी। तब वह मित्र अपनी इज्‍जत बचाने के लिए मेरी इज्‍जत पर खेल गया होगा। अपनी जगह मेरा नंबर लिखवा कर आ गया होगा।

फिर भी बता दूं… मैं कोई चौरसिया और सरदेसाई नहीं हूं। सुधीर चौधरी और रजत शर्मा जैसा ‘बड़ा’ पत्रकार भी नहीं हूं। बस मामूली तनख्‍वाह पर 12 घंटे ड्यूटी बजाने वाला मामूली पत्रकार हूं। मेरे पास एक आल्टो है, जिसकी ईएमआई भी पिताजी के खाते से जाती थी। मुझ पर रहम करो। मुझे बख्‍श दो भाई।

(धर्मेंद्र कंवारी के फेसबुक वॉल से प्रेरित)

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