प्रधान जी की ख़ामोशी नहीं सहेंगे
प्रधान जी की ख़ामोशी नहीं सहेंगे

प्रधान जी की ख़ामोशी नहीं सहेंगे

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। करीब दो साल पहले एक फ़िल्म आई थी- बाहुबली। इस फ़िल्म ने शिग़ूफ़े के तौर पर एक बड़ा सवाल भारतीय जनमानस के लिए छोड़ दिया था। तब से यह सवाल देशवासियों के दिमाग को मथ रहा था, जिसका जवाब किसी के पास नहीं था। सिर्फ़ दो लोगों के पास इसका जवाब था- एस.एस. राजामौली, जिन्‍होंने करीब 300 करोड़ रुपये खर्च कर बाहुबली बनाई और दूसरे थे प्रधान सेवक। लेकिन दोनों ने इस ज्‍वलंत प्रश्‍न पर एक शब्‍द भी बोलना मुनासिब नहीं समझा।




राजामौली की चुप्‍पी तो समझ में आती है, क्‍योंकि उन्‍होंने पहले ही ठान लिया था कि इस सवाल के जवाब से वह फिर मोटी कमाई करेंगे। बाहुबली-2 बनाकर उन्‍होंने इस आशंका को स्‍थापित भी कर दिया है। लेकिन प्रधान सेवक की चुप्‍पी समझ में नहीं आई। वह खु़द को देश का सेवक कहते हैं! ऐसे में इतने सुलगते सवाल पर चुप रहना क्‍या देश और देशवासियों के साथ छल नहीं है? अब जबकि उत्‍तर प्रदेश में चुनाव हो रहे हैं, तब उन्‍होंने राज़फ़ाश किया कि उन्‍हें मालूम था कि कटप्‍पा ने बाहुबली को क्‍यों मारा। राजामौली तो अपने आर्थिक मुनाफ़े के लिए चुप रहे। यह बात तो समझ में आती है। लेकिन राजनीतिक फ़ायदे के लिए प्रधान सेवक का इतने लंबे समय तक चुप रहना और देशवासियों को परेशान होते देखना समझ से परे है। ख़ासकर तब जब बाहुबली के प्रति देशवासियों की सहानुभूति थी।

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यूपी में बीजेपी की सरकार आने पर बाहुबलियों की ख़ैर नहीं

तमिलनाडु में अम्‍मा के निधन पर सहानुभूति बटोरकर शशिकला अन्‍नाद्रमुक की महासचिव बन गईं। मुख्‍यमंत्री भी बन जातीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जब उन्‍हें सज़ा सुनाई तो उन्‍होंने अपने एक विश्‍वासपात्र को आगे कर दिया। लोगों ने उसे भी अम्‍मा के उत्‍तराधिकारी के तौर पर अपना लिया। यह सब देखते हुए प्रधान सेवक की लंबी ख़ामोशी देशवासियों की भावनाओं के विपरीत लगती है।

प्रधान सेवक के दावे से मेरे मन में कुछ आशंकाएं जन्‍म ले रही हैं। इस ज्‍वलंत मुद्दे पर उनकी ख़ामोशी का क्‍या कोई आर्थिक पक्ष भी जुड़ा हुआ है? इस सवाल का जवाब इसलिए ज़रूरी है कि बाहुबली-2 का मोशन पिक्‍चर जारी होने के बाद उन्‍होंने अपना मुंह खोला। क्‍या इसका मतलब यह है कि वह फिल्‍म का प्रमोशन कर रहे हैं? क्‍या उन्‍हें इससे कोई आर्थिक लाभ पहुंचाया जा रहा है ताकि वह इसका इस्‍तेमाल चुनाव में कर सकें? अगर ऐसा है तो चुनाव आयोग को इस पहलू पर ग़ौर करना चाहिए। क्‍या राजामौली से इस बारे में प्रधान सेवक या उनकी पार्टी का कोई खु़फि़या समझौता हुआ है? देशवासियों को इन सब सवालों का जवाब जानने का पूरा हक़ है। प्रधान सेवक, उनके मंत्री और उनकी पार्टी बिना आरटीआई के ही जवाब दे सके तो बेहतर है। नहीं तो ज़रूरत पड़ने पर इस राष्‍ट्रीय मुद्दे को लेकर आरटीआई भी डाला जा सकता है।




एक और सवाल है। इसकी भी प्रकृति गंभीर ही है। बाहुबली का पक्ष सकारात्‍मक था और कटप्‍पा का नकारात्‍मक। लेकिन प्रधान सेवक ने मऊ में एक भरी सभा में बाहुबली को मारने वाले कटप्‍पा की तारीफ़ क्‍यों की? उन्‍होंने कहा था, एक चलचित्र आया था बाहुबली अब बाहुबली सिनेमा में तो ज़रा अच्छे लगते हैं। थोड़े समय उनमें दम भी दिखता है, लेकिन कहते हैं कि बाहुबली फ़िल्म में एक कट्टप करके पात्र था। बाहुबली का सबकुछ उसने तबाह कर दिया था। बीजेपी यूपी की सत्ता में आई तो सभी अपराधियों से कटप्पा की तर्ज पर निपटेगी। 11 मार्च को जब चुनावी नतीजे आएंगे तो बाहुबलियों के लिए मुश्किल होने वाली है। इस बयान के क्‍या निहितार्थ निकाले जाएं? क्‍या यूपी में बीजेपी की सरकार बनेगी तो गुण्‍डों से निपटने के लिए गुण्‍डागर्दी करेगी? क्‍या अच्छे लोग सिर्फ़ परदे पर ही अच्‍छे लगते हैं, वह भी कुछ समय के लिए? बहरहाल, उन्‍होंने हमेशा की तरह इस सवाल का भी जवाब नहीं दिया कि कटप्‍पा ने बाहुबली को क्‍यों मारा? इस मुद्दे पर उनकी ख़ामोशी और आधे-अधूरे जवाब को अब और बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा।

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