फेसबुक पोस्ट से कब्जियत का पता लगता है
फेसबुक पोस्ट से कब्जियत का पता लगता है

फेसबुक पोस्ट से कब्जियत का पता लगता है

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मेरे एक बेहद करीबी रिश्तेदार हैं शुक्ला जी। उन्हें बरसों से कब्ज की शिकायत है। बनारस में जब मैं इंटरमीडिएट में था तो वे हमारे साथ ही रहते थे। ‘पेट सफा तो हर रोग दफा’ जैसे चूर्ण खाते थे, लेकिन सुबह बाथरूम से अक्सर ‘खाली हाथ’ ही लौटते थे। कुछ ठोस निकल नहीं पाता था, लिहाजा जहरीली गैस छोड़ते थे। तमाम इलाज फेल। एक रोज बनारस में एक डॉक्टर साहब मिले, बोले-शुक्ला जी ग्लिसरीन पी लीजिए, चाहे जितना पुराना कब्ज हो, साफ हो जाएगा। हम लोगों ने दबाव डालकर शुक्ला जी को रात में 250 मिलीलीटर ग्लिसरीन पिलवा दिया।

अगली सुबह शुक्ला जी बाथरूम से लौटे तो बेहद नाराज थे। बोले-जो निकलना था, वो तो वहीं रह गया, ग्लिसरीन ही बह गया। कब्जियत या कॉन्स्टिपेशन या फिर शौच पर सार्वजनिक रूप से बातचीत को वर्जित विषयों में रख दिया गया है, लेकिन सच्चाई ये है कि अगर पेट सही नहीं है तो जिंदगी में कुछ भी सही नहीं होगा। शुजीत सरकार ने इसी विषय पर शानदार फिल्म ‘पीकू’ बनाई थी। जिसमें अमिताभ बच्चन ने कब्जियत के मरीज का अद्भुत किरदार निभाया था। सुनते हैं कि एक चिरकीन नाम के कवि भी हुए थे, जिन्होंने जीवन भर कविता के नाम पर सिर्फ ‘दस्त’कारी ही की। उनका कवि सम्मेलनों से बायकाट हो चुका था। एक बार बड़ी मिन्नत पर उन्हें मौका मिला। शर्त रखी गई कि आप अपने उस प्रिय विषय पर कुछ नहीं सुनाएंगे। चिरकीन ने माइक पकड़ा और शुरू किया- बाद मुद्दत के जो चिरकीन का यहां आना हुआ। बाद मुद्दत के जो चिरकीन का यहां आना हुआ। श्रोता वाह वाह कर उठे। चार बार उन्होंने पहली लाइन दोहराई, फिर दूसरी लाइन पढ़ी। पहले तो ऐंठन हुई, बाद में पखाना हुआ। गांवों में शौच के कई पर्यायवाची गढ़े गए थे। जैसे-मैदान, निपटान, खुलासा, बाहर..वगैरह वगैरह। एक बार देर रात करीब 12 बजे मैं दफ्तर से आने के बाद वॉशरूम गया था। इसी बीच मेरे एक दोस्त का फोन आया। पत्नी ने उठाया, दोस्त ने पूछा-कहां हैं, श्रीमतजी बोलीं-मैदान में हैं। दोस्त चौंका-इतनी रात मैदान में क्या करने गये हैं। खैर, तब तक श्रीमतीजी संभल गई थीं, बोलीं-वाशरूम में हैं। पूर्वांचल के ब्राह्मणों के घर शादियों में खाना और लोटा लेकर जाना मैदान जाना बड़ा मशहूर रहा है।

हमारे छोटे से पंक्तिपावन समाज में तो 5 दिन की बारात रहती थी। मिठाइयों में बाकले (चने का फलाहारी रूप) का लड्डू ही शादियों का राजा होता था। बाकले का लड्डू पचाना सबके बस की बात नहीं। अगर वो पच भी गया फिर बेहिसाब पूड़ी-कचौड़ी, कटहल, कद्दू की सब्जी। ऐसे में तमाम बाबा जी लोगों का पेट छूट जाता था। सुबह पौ फटने से पहले तमाम लोग लोटा लेकर मैदान में पेड़ की आड़ में पहुंच जाते, सिलसिला दिन भर चलता रहता। कुछ नौकर-चाकर वाले बाबाजी लोगों के साथ लोटा उनका नौकर लेकर चलता था। इस पर भी कवित्त बना, जो अक्सर बारातों में लोग सुनाते थे- एक भक्त भगेलू को साथ लिए, मुनि बारहिं बार चलें पोखरा। पेट पुरातन छूटि गयो, सब डूब गयो पोखरी-पोखरा। मेरी बड़ी बहन की शादी में बारातियों ने जमकर लड्डू खाए, पांचवें दिन बारात जब विदा हुई तो गांव के सीवान में कई पेड़ों के पास धोतियां और गमछे मिले। जिस बस में बरात वापस भेजी गई, उसमें से अचानक आवाज आती, ड्राइवर साहब, गाड़ी रोको..। गाड़ी रुकती, समस्या हल होती, फिर चलती। कई बार ऐसी भी आवाज आई-अरे गाड़ी रोको..गाड़ी रोको…। अब रोककर ही क्या किए। यानी कि देर हो चुकी थी। पेट पुरातन का प्रकोप धोती ने ही झेल लिया था। जबसे नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने, शौच वर्जित विषय नहीं रह गया। उनका सारा जोर शौच और शौचालय पर ही है।

इस विषय पर ‘पीकू’ के बाद ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ नाम की फिल्म भी आ रही है। देश में उनकी तादाद बहुत ज्यादा है, जिनका हाजमा खराब है। जिसका हाजमा खराब है, उसका दिल और दिमाग भी दुरुस्त नहीं रह पाता। फिल्म ‘पीकू’ के आखिर में नायक भास्कर का डॉक्टर उनकी बेटी पीकू को बताता है कि जिस लड़के के साथ उसकी दोस्ती है, उसे कॉन्स्टिपेशन है। लड़की अगले ही शॉट में इरफान के साथ बैडमिंटन खेलती नजर आने लगती है। संदेश भी है कि किसी के साथ जीवन भर का रिश्ता जोड़ने से पहले जरा पेट का हाल भी पता कर लो। फेसबुक पर तमाम लोगों की पोस्ट पढ़कर मुझे भी शक होता है कि इनका हाजमा दुरुस्त नहीं है, कब्जियत है। पेट साफ नहीं है और बदबू फेसबुक पर फैला रहे हैं।

विकास मिश्रा की फेसबुक वाल से 

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