वादे पर मत जाना, अपनी अक्ल लगाना
वादे पर मत जाना, अपनी अक्ल लगाना

वादे पर मत जाना, अपनी अक्ल लगाना

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अभी-अभी आम आदमी पार्टी वालों ने घर पर धावा बोल दिया। मुझसे वोट मांगने लग गए! मैंने पूछा -“वोट लेकर क्या करोगे?” छूटते ही भीड़ में से एक उत्साही बोला- “हाऊस टैक्स माफ़ करेंगे”…साथ में मौजूद 30-35 लोगों ने इसमें अगला सूक्त वाक्य “गली मोहल्ले साफ़ करेंगे” जोड़ कर नारा पूरा कर दिया। …नतीजा कान ने अपने शटर गिरा दिए और मैं भौंचक इलाहाबादी टाइप सबके मुंह ताकता रह गया। 20-30 सेकेण्ड तक कौन क्या बोला… सुन नहीं सका। बस होंठ फड़फड़ाते हुए दिखे।

अचानक होने वाले ध्वनि हमले के लिए न तो मैं तैयार था और न मेरा कान। 20-30 सेकेण्ड में कान का शटर खुला तो दिमाग़ का मरकरी चढ़ चुका था। मैंने लगभग झल्लाते हुए कहा-“मांग-मांग कर सरकार बना लिया… अब तक तो सफाई की नहीं। अब क्या कर लोगे?”

अचानक एक महिला की आवाज गूंजी। मैं हैरान! सामने तो कोई महिला है ही नहीं! फिर ये आवाज़ कैसी? मेरे अंदर भक्ति की भावना लहराने लगी… यह सोचकर की आकाशवाणी हुई है! मैं ऊपर की तरफ जाती सीढ़ियों की तरफ देखा तो सामने खड़ा एक युवक अपने आप बोल पड़ा। आपकी निगाहें जिसे ढूंढ़ रही हैं, वो आपके दरवाजे के पीछे खड़ी हैं। मैंने धड़ को खींचते हुए मुंडी को दरवाजे के पीछे लटका दिया। महिला ने बड़ी आत्मीयता से हाथ जोड़े और अधरों को रबड़ की तरह खींचते हुए उसे फैला दिया। इस विनम्र प्रक्रिया के बाद उसके होंठ अब मुस्कुराने की मुद्रा में थे। पता नहीं क्यों मुझे उस मुस्कराहट के पीछे एक भाव दिखा। जब कोई मार्मिक बहाना बनाकर आपसे रुपये ऐंठने में सफल हो जाता है…बिलकुल वैसा ही भाव महिला अधरों पर खींची हुई मुस्कराहट के पीछे से झांकती हुई प्रतीत हुई। मैं कुछ पूछता, उस से पहले ही महिला बोल पड़ी- “मैं फलां रावत। हमें और हमारी पार्टी को अपना बहुमूल्य वोट देकर विजयी बनायें।” मैं अपनी गज भर लंबी ज़ुबान को समेट कर रखने के लिए मुंह बंद करता… इससे पहले ही वह फुदक कर बाहर निकल चुकी थी।
“…और बेवक़ूफ़ न बनायें!” मैं घबरा गया की कहीं भीड़ उन्मादी न हो जाए।
बात बिगड़ न जाये, इसलिए तत्काल मैंने पैंतरा बदलते हुए कहा- “अबतक सफाई नहीं होने का कोई कारण…?” भीड़ से जवाब आयी- “सरकार हमारी है, लेकिन सफाई बीजेपी की जिम्मेदारी है।” सुनकर तो मेरा पूरा गणित ही गड़बड़ा गया। लेकिन महिला शायद ताड़ गयी! जब तक मैं आवाज़ का पीछा करते हुए उसके स्रोत तक पहुँचता अर्थात् यह जान पाता कि कौन बोला? महिला बोल पड़ी। कहा- “हम अभी तक बंधे हाथों से काम कर रहे हैं। आप एक मौका दीजिये …फिर देखियेगा। गली-गली चमचमाती हुई दिखेगी।”
मेरी नज़र उसके हाथों पर पड़ी जो उसने याचक की मुद्रा बनाते हुए जोड़ रखे थे। हाथ खुले हुए थे। उसने ज़बरदस्ती जोड़ कर रखा हुआ था। 2-3 मिनट का समय मेरे लिए 2-3 घंटे जितना लंबा लग रहा था। मैं अपने मन की बात सुन रहा था, जो कह रहा था … मुफ्तखोरी की आदत मत लगाओ। इसे जल्दी निपटा कर नीचे का रास्ता दिखाओ। मैंने तत्काल हाथ जोड़ते हुए महिला की तरह ही अपने अधरों को रबड़ की तरह खींचकर सिर हिला दिया। मुझे बाहर जाना था, लेकिन दरवाज़ा बंद कर के बिस्तर पर पसर गया और हाऊस टैक्स माफ़ी के गणित में उलझ गया।

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