हसरतें मचलती रह गईं मुस्‍टंडों के
हसरतें मचलती रह गईं मुस्‍टंडों के

हसरतें मचलती रह गईं मुस्‍टंडों के चलते

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। कभी-कभी तो सोचता हूं कि मैं रोम में पैदा होता तो सेंट वेलेंटाइन के ज्‍यादा करीब होता। हमारे देश में प्रेमियों की कद्र ही नहीं है। वेलेंटाइन डे सूखे पतझड़ के मौसम की तरह आया और चला भी गया। लेकिन मेरी हसरतें मुस्‍टंडे लठैतों के चलते मचलती रह गईं।

पटना वाले प्रोफेसर साहब तो याद ही होंगे।… वही मटुकनाथ जी… बेचारे ने जूली से ब्‍याह क्‍या किया जमाने ने उनका मुंह काला कर दिया। छात्रा क्‍या प्रेमिका नहीं हो सकती? कॉलेज ने बेचारे ‘लव गुरु’ को सस्‍पेंड कर दिया। बरसों बाद फिर बहाल हुए, लेकिन इस बार पार्टी में डांस करने पर मुअत्‍तल कर दिया। बहुत अंधेरगर्दी है जी।

प्रेम का पखवाड़ा शुरू भी नहीं होता कि संस्‍कृति के ठेकेदार छुट्टे सांड की तरह प्रेमियों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मुंह काला करते हैं। कभी कहते हैं पकड़ लिया तो ब्‍याह करा दूंगा… भले ही कोई बहन-बेटी के साथ ही क्‍यों न घूम रहा हो। राखी बंधवा दूंगा। अरे करमजलों… प्रेमिका को प्रेमिका ही रहने दो। लड़कियों की इतनी ही फिक्र है तो उन्‍हें अपनी बहन बना लो। बेड़ागर्क हो तुम्‍हारा। अब तो ये फेसबुक के भी रंगबाज हो गए हैं। वहां भी इनका कर्फ्यू हैं। सरकार को चाहिए कि इन्‍हें चौकीदार बनाकर कहीं बैठा दे।

मैं पूछता हूं कृष्‍ण से बड़ा कोई प्रेमी हुआ है क्‍या? उस समय तो कोई लट्ठधारी पैदा न हुआ। कहां 16,000 और कहां बरसों की मेहनत के बाद एक मिली। फिर भी तरस कौन खाए। सारी जोर आजमाइश हम निरीह प्रेमियों पर ही कर लो। वेलेंटाइन डे पर चॉकलेट न खाएं तो क्‍या गुरुद्वारे में लंगर खाएं?

मेरी गाड़ी पटरी पर थी। कहानी Rose Day से बढ़कर Hug Day तक पहुंच गई थी। बस दो सीढ़ी के बाद प्रेम की खुली छत थी। दो दिन बाद लोधी गार्डन में मिलने का वादा था। तय दिन को वह पूरे सोलह सौ रुपये पार्लर में देकर चेहरे की रिपेयरिंग करा चुकी थी। वहां से निकलती इससे पहले ही एक चुड़ैल ने बाकायदा फोन करके कहा- आज कहीं मत जाना। मैंने अपना प्‍लान भी होल्‍ड पर रखा है। पार्कों में निठल्‍ले सांड घूम रहे हैं। इज्‍जत का फलूदा हो जाएगा।

मेरे अरमानों पर वज्रपात के लिए उनकी इतनी होशियारी काफी थी। मोहतरमा वहीं से बैरंग घर। मैं मनाता रहा … आ जा। कहीं कोई लफड़ा नहीं है। लेकिन नहीं… उसे अफसोस मुझसे नहीं मिल पाने से ज्‍यादा इस बात का था कि 1600 रुपये का पॉलिश किया मुखड़ा उसने खुद देखा, किसी और ने नहीं। …और इधर मैं ‘गुलाबो जरा इतर गिरा दो… जरा गंध फैला दो’ सुन-सुन कर वेलेंटाइन डे गुजार रहा था।

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