गंधर्वों ने दुर्योधन सहित कौरवों के
गंधर्वों ने दुर्योधन सहित कौरवों के

गंधर्वों ने दुर्योधन सहित कौरवों के कपड़े तक उतरवा दिए थे

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। जुए में हराने के बाद दुर्योधन 12 साल के लिए पाण्‍डवों को जंगल में भेजने में सफल हो गया था। पाण्‍डव काम्‍यक वन में रहे, जहां अर्जुन घोर तपस्‍या से तरह-तरह के दिव्‍यास्‍त्र प्राप्‍त कर चुका था। जब वनवास का समय खत्‍म होने को आया तो पाण्‍डवों ने एक ब्राह्मण को हस्तिनापुर भेजा। उसने धृतराष्‍ट्र को पाण्‍डवों की बदहाली की कहानी सुनाई। साथ ही, बताया कि अर्जुन दिव्‍यास्‍त्र पाकर और भी बवाली हो गया है। यह सब सुनकर धृतराष्‍ट्र बहुत घबरा गया। उसे लगा कि अब तो पाण्‍डव उसके बेटों को कतई नहीं छोड़ेंगे।

यह सब देख-सुन कर दुर्योधन, शकुनि और कर्ण ने पाण्‍डवों को चिढ़ाने की योजना बनाई। कर्ण ने कहा, पाण्‍डवों को चिढ़ाने का यह सही मौका है। हम जंगल चलते हैं। भिखारी पाण्‍डवों को हम अपना अतुल ऐश्‍वर्य दिखाएंगे तो मजा आएगा। दुर्योधन ने कहा, लेकिन मुश्किल यह है कि बाऊजी हमें काम्‍यक वन जाने नहीं देंगे। उन्‍हें डर है कि पाण्‍डव हमें मार देंगे। अगर उन्‍हें यह पता चला कि हम पाण्‍डवों को चिढ़ाने जा रहे हैं तब तो कतई इजाजत नहीं देंगे।

तब कर्ण ने दु:शासन और शकुनि के साथ गायों की गिनती करने के बहाने द्वैतवन जाने की योजना बनाई। शकुनि की जबरदस्‍त पैरवी पर धृतराष्‍ट्र ने दुर्योधन को जंगल जाने की इजाजत दे दी। साथ ही, हिदायत दी कि पाण्‍डव भी वहीं आसपास हैं, इसलिए उनसे छेड़छाड़ मत करना, वरना तुम सब जान से हाथ धो बैठोगे। इस पर शकुनि ने आश्‍वासन दिया कि वे ऐसा नहीं करेंगे। दुर्योधन और कर्ण ने भी हां में हां मिलाई।

दूसरे दिन कर्ण के साथ दुर्योधन अपने भाइयों, उनकी बीवियों, हस्तिनापुर के कुछ लोगों के साथ 8,000 रथ, 30,000 हाथी, 9,000 घोड़े और अनगिनत पैदल सिपाहियों को लेकर रवाना हुआ। धृतराष्‍ट्र ने कुछ बूढ़े मंत्रियों को भी साथ भेजा ताकि वो मामला बिगड़ने पर उसे संभाल सकें।

द्वैतवन में पहुंचकर एक सरोवर से दो कोस पहले डेरा डाला गया। वसंत की चांदनी रात थी। दुर्योधन ने नौकरों और सिपाहियों को सरोवर का जायजा लेने के लिए भेजा। वहां तालाब में गंधर्वों का राजा चित्रसेन अप्‍सराओं के साथ्‍ज्ञ जल-क्रीडा कर रहा था। गंधर्वों ने दुर्योधन के कारिंदों को भगा दिया। यह सुनकर दुर्योधन ने गंधर्वों को भगाने के लिए सेना भेजी। गंधर्वों ने हथियार चमकाते हुए उन्‍हें खुदागंज पहुंचाने की धमकी दी तो सभी पतली गली से निकल गए। इससे दुर्योधन और भड़क गया। उसने दु:शासन की अगुआई में हजारों सैनिकों को भेजा।

दु:शासन जब धक्‍का-मुक्‍की करके जबरदस्‍ती आगे बढ़ने लगा तो गंधर्वों ने उसे प्‍यार से समझाया। जब वह नहीं माना तो उन्‍होंने चित्रसेन को इसकी सूचना दे दी। राजा ने कह दिया कि सबको मारकर भगाओ। ऑर्डर मिलते ही गंधर्व टूट पड़े। कौरवों को इस हमले की उम्‍मीद नहीं थी। वे तो यही सोच रहे थे कि भौकाल से ही काम चल जाएगा। गंधर्वों के हमले से कौरव भागने लगे। लेकिन कर्ण डटा रहा। कर्ण ने गंधर्वों का बहुत नुकसान किया, लेकिन उनके मायावी युद्ध कला के आगे टिक नहीं सका। बुरी तह घायल होने के बाद जब कर्ण भाग गया तो गंधर्व कौरवों पर चढ़ बैठे। तब उन्‍होंने सम्‍मोहन अस्‍त्र से दुर्योधन सहित कौरवों और उनके लड़ाकों को बेहोश कर स्त्रियों के साथ उन्‍हें पकड़ लिया। इतना ही नहीं, गंधर्वों ने इन सबके कपड़े भी उतार लिए और बांधकर ले गए।

तब कौरवों के भगोड़े सैनिक पास के जंगल में गए जहां पाण्‍डव रहते थे। वे युधिष्ठिर के पैरों में गिरकर कौरवों को बचाने के लिए गिड़गिड़ाए तो वह मान गए। हालांकि चारों भाइयों ने पहले तो विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए और गंधर्वों से उन्‍हें छुड़ा लाए।

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