धनुर्धारी अर्जुन डिप्रेशन का मरीज था
धनुर्धारी अर्जुन डिप्रेशन का मरीज था

धनुर्धारी अर्जुन डिप्रेशन का मरीज था

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Krishna preaching Arjun in kurukshetraनुक्‍कड़ टाइम्‍स

गांडीवधारी अर्जुन को डिप्रेशन की शिकायत थी। एकबार तो महाभारत युद्ध से ठीक पहले उसे डिप्रेशन का बहुत बड़ा अटैक आया।

कौरव और पाण्‍डवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थी। युद्ध बस शुरू ही होने वाला था। श्रीकृष्‍ण सारथी बन गए थे। तभी अर्जुन डिप्रेस्‍ड हो गया। धनुष-बाण फेंक कर वह रथ के पीछे बैठ गया। यह देखकर चारों भाई और उनकी सेना भी सकपका गई। ऊपर देवता भी दोनों टीमों का मैच देखने के लिए पहुंच गए थे। वे भी चकरा गए कि मैच नहीं होगा क्‍या? अर्जुन को अचानक क्‍या हो गया?





श्रीकृष्‍ण अपने मित्र और चेले के रग-रग से वाकिफ थे। वह उसके पास गए। पूछा- क्‍या हुआ? तब अर्जुन बोला- हे केशव! रायता बहुत फैल गया है। इसे बिना लड़ाई के समेटा नहीं जा सकता क्‍या? सामने तो सभी अपने ही हैं। सब मारे जाएंगे। तब राजपाट लेकर क्‍या अचार डालूंगा? श्रीकृष्‍ण समझ गए, चेला बहुत ज्‍यादा इमोशनल हो गया है। मारे घबराहट के डिप्रेशन में चला गया है। तब क्राइसिस मैनेजमेंट के तहत उन्‍होंने अर्जुन की काउंसलिंग की। अर्जुन की इस दशा को विषाद योग का नाम दिया गया है। भगवद् गीता का पहला अध्‍याय इस पर है।

उन दिनों लाइव टेलीकास्‍ट जैसी कोई तकनीक तो नहीं थी। लेकिन संजय के पास ऐसा पावर था कि वह कहीं से कुछ भी देख सकता था। धृतराष्‍ट्र कुछ ज्‍यादा ही अधीर हो रहे थे यह जानने के लिए उनके बेटे मैदान में कैसा परफॉर्म कर रहे हैं। संजय कुरुक्षेत्र का पूरा सीन कैप्‍चर करके अपने व्‍याकुल महाराज को सुना रहा था।

ग्‍वालों ने जब घेरा तो कुछ नहीं कर पाया

खैर, साइको ट्रीटमेंट के बाद अर्जुन मैदान में उतरा। 18 दिनों तक महाभारत का युद्ध चला। युद्ध खत्‍म होने के बाद श्रीकृष्‍ण अर्थात् श्रीहरि बैकुण्‍ठ चले गए। बलराम (बलभद्र) जो कि शेषनाग का रूप थे, वह पाताल लोक गए। इधर, श्रीहरि के जाते ही समुद्र ने उनके निवास स्‍थान को छोड़कर शेष द्वारकापुरी को डुबो दिया। इससे श्रीकृष्‍ण की रानियां बेघर हो गईं। ये वास्‍तव में अप्‍सराएं थीं जो अष्‍टावक्र के श्राप के कारण मनुष्‍य रूप में धरती पर आई थीं। जब अर्जुन उन सभी बेसहारा रानियों को लेकर हस्तिनापुर की ओर जा रहे थे। तभी रास्‍ते में लाठी-डण्‍डों से लैस ग्‍वालों ने उन्‍हें घेर लिया। अर्जुन को छॉंट-छॉंट कर गालियां दीं। पीटा कि नहीं इसका पता नहीं चल सका। इसके बाद ग्‍वाले सभी रानियों को अगवा कर ले गए, किन्‍तु महान धनुर्धारी कुछ नहीं कर सके।

महर्षि व्‍यास से भी काउंसलिंग कराई

इस घटना के बाद अर्जुन फिर डिप्रेशन में चला गया। तब महर्षि व्‍यास ने उसकी काउंसलिंग की। उन्‍होंने उसे समझाया, देखो बेटा! ज्‍यादा सूपस्टिशस (वहमी/अंधविश्‍वासी) होने की जरूरत नहीं कि तुम्‍हारे पास ये शक्ति है…वो शक्ति है। तुम्‍हारे पास अपना कुछ भी नहीं है। इसके बाद अर्जुन को अहसास हुआ कि वह तो कॉमन मैन है। उसकी सारी शक्ति तो श्रीकृष्‍ण थे। मतलब जब तक श्रीकृष्‍ण थे उसका भौकाल टाइट रहा। शर्मिंदगी के बोझ से दबे वह हस्तिनापुर पहुंचा और सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर, जो कि राजा थे,  को सारी बात बताई। अपनी कमजोरी स्‍वीकार करते हुए कहा- भैया! वही धनुष है। बाण भी वे ही हैं। रथ और घोड़े भी वही हैं। लेकिन श्रीकृष्‍ण के नहीं रहने से सब ख़त्‍म हो गया। अर्जुन की स्‍वीकारोक्ति से युधिष्ठिर का माथा ठनका। सोचा ..अरे बाप रे! गाण्‍डीवधारी तो एकदम कॉमन मैन बन गया है। अब तो ये गुहियां भी नहीं उखाड़ सकता है। उन्‍होंने सोचा कि अब ताकत तो रही नहीं, इसलिए निकल लेने में ही भलाई है। यह सोचकर युधिष्ठिर ने परीक्षित को राजसत्‍ता सौंप दी। इसके बाद द्रौपदी और भाइयों के साथ युधिष्ठिर स्‍वर्ग चले गए।

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3 Comments

  1. Its a very amusing information…. Though many must be knowing about this… Still the presentation has a uniqueness..

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