ज्‍योतिष और वास्‍तु से भी कांग्रेस की
ज्‍योतिष और वास्‍तु से भी कांग्रेस की

ज्‍योतिष और वास्‍तु से भी कांग्रेस की किस्‍मत नहीं बदल रही

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। दुर्वासा ऋषि के श्राप से जैसे स्‍वर्ग लोक श्री विहीन हो गया था, लगता है कांग्रेस को भी इसी टाइप का श्राप लगा है। ज्‍योतिष, वास्‍तु, चादरपोशी और दरिद्र भोज कराने जैसे लाल किताब के तमाम टोने-टोटके कराने के बाद भी उसकी किस्‍मत नहीं बदल रही।

कुछ महीने पहले निर्मल बाबा मावलंकर हॉल में कृपा बरसा कर लौट रहे थे। अकबर रोड से गुजरते समय उजाड़ कांग्रेस मुख्‍यालय को देखा तो रेडियो टैक्‍सी वाले से गाड़ी गेट के अंदर लेने को कहा। वहां कोई नहीं दिखा तो बाबाजी अंदर बढ़ गए। अंदर दायें हाथ पर भीतर एक कमरे में राहुल गांधी बैठे थे। उनके साथ कुछ चेले-चाटी भी थे। निर्मल बाबा को देखते ही सब जमीन पर लोट गए। बाबाजी ने भी कृपा बरसा दी।

यह सब देखकर राहुल गांधी ने एक चेले को इशारा किया तो उसने अपना कान उनके मुंह के आगे रख दिया। राहुल ने पूछा- ये कौन साहब हैं? तुम सब लोटा-लोटी करके अपने कलफ़ कुर्ते-पायजामे क्‍यों गंदे कर रहे हो? चेला बोला- सर जी, ये वही बाबा हैं जो कृपा बरसाते हैं। टीवी पर अक्‍सर अपने दरबार में दीन-दुखियों पर कृपा बरसाते दिख जाएंगे। ज्‍यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं, आधी रात को एक-दो न्‍यूज चैनल पर भी इनका दरबार लगा सजा हुआ मिल जाएगा।





राहुल- हम्‍म। (तब तक एक चेले ने निर्मल बाबा को अपनी कुर्सी ऑफर कर दी और बाबाजी उस पर विराजमान हो गए।) कुछ देर सोचने के बाद राहुल बोले- बाबाजी अध्‍यात्‍म में मेरी भी रुचि है। अभी कुछ दिन पहले ही विपस्‍सना का कोर्स करके आया हूं। आपको क्‍या लगता है… कृपा कहां रुकी हुई है? निर्मल बाबा एक क्षण के लिए आंखें बंद करने के बाद बोले- बाहरी दीवारों पर बरसाती काई जमी हुई है। घर की पुताई कब कराई थी?

राहुल- 2014 में पुताई कराने के लिए ठेका दे दिया था। सोचा था कि तीसरी बार सरकार बन जाएगी तो ह्वाइट वाश के साथ पीओपी भी करा दूंगा। लेकिन हमारी सरकार नहीं बनी। तब से हर काम बिगड़ रहा है। बाबा बोले- कृपा वहीं रुकी हुई है। पुताई करा लो, कृपा आने लगेगी। इसके बाद हफ्ते दिन के भीतर ही मुख्‍यालय का ह्वाइट वाश हो गया। कई महीने बीत गए, लेकिन कृपा नहीं बरसी।

किसी ने सुझाया कि इंडिया के टॉप ज्‍योतिषी के.एन. राव दिल्‍ली में ही पटपड़गंज एरिया में रहते हैं। उनकी सलाह लीजिये। गारंटी मान कर चलिए… फायदा जरूर होगा। राहुल गांधी ने राव साहब को जन्‍म पत्री दिखाई तो उन्‍होंने टोटका बता दिया। बोले- जहां काम करते हो, वहीं कबूतरों को चारा डालो। अगले दिन राहुल बाजरा लेकर दफ्तर पहुंचे। उन्‍होंने सोचा कि अभी तो यहां कोई नहीं आता, लेकिन कबूतरों को दाना डालने के बाद जब लोगों की आवाजाही बढ़ जाएगी तो कबूतर दब कर मर जाएंगे। इसलिए छत पर ही दाना डालना ठीक रहेगा।

अब सामने नई समस्‍या खड़ी हो गई। सीढ़ी नहीं थी। मुलायम सिंह यादव का बंगला पास में ही है। उन्‍होंने अरदली को मुलायम यादव के यहां से सीढ़ी लाने भेजा। सीढ़ी आ गई तो दाना डाला गया। दाना देखकर कबूतर भी झुण्‍ड में चुगने आ गए। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। एक सलाहकार ने कहा कि कहीं वास्‍तु दोष तो नहीं आ गया। इस पर विचार के बाद वास्‍तु विशेषज्ञ को बुलाया गया। उसने देखते ही कहा कि इस घर में तो कबूतरों का डेरा है। घर में इनके रहते बरकत नहीं आएगी। चुग्‍गा कहीं और डालो। तब से राहुल चुग्‍गा मुलायम सिंह के घर के आगे डालने लगे। थोड़ा फायदा होता दिख रहा था कि बात फिर बिगड़ गई।

(डिसक्लेमरः यह सिर्फ चकल्‍लस है और इसमें कोई सच्चाई नहीं है। इसका उद्देश्‍य किसी को आहत करना नहीं है, बल्कि लोगों को गुदगुदाना है।)

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