द्रौपदी कर्ण से प्‍यार करती थी
द्रौपदी कर्ण से प्‍यार करती थी

द्रौपदी कर्ण से प्‍यार करती थी

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

‘अगर मैं उससे शादी की होती तो जुए में नहीं हारी जाती… भरी सभा में सरेआम बेइज्‍जत नहीं होती और वेश्‍या नहीं कहलाती।‘ द्रौपदी ने अपना दर्द रोज एक पेड़ के समक्ष कुछ इस तरह कबूल किया था।

उन दिनों पाण्‍डव 13 वर्षों के वनवास पर थे। एक दिन की बात है। जंगल में द्रौपदी ने पेड़ से जामुन तोड़ लिया। उसके ऐसा करते ही पेड़ बोल पड़ा- ’12 वर्षों से यह फल लटक रहा था। यह वर्षों से तपस्‍या कर रहे एक ऋषि के लिए सुरक्षित था। आज के बाद वह तपस्‍या पूरी करके अपनी ऑंखें खोलने ही वाले थे। वही इस फल को खाते। 12 वर्षों के बाद यह उनका पहला आहार होता। लेकिन तुमने उसे अपवित्र कर दिया। अब वह भूखे ही चले जाएंगे और तुम्‍हें अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ेगा।’

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यह सुनकर द्रौपदी घबरा गई। तुरंत अपने पतियों को बुलाया और फल को पुन: पेड़ से लगाने की गुहार लगाई। लेकिन कोई भी उसे दोबारा पेड़ पर नहीं लगा सका। यह सब देखकर पेड़ ने कहा, अगर तुम में सतीत्‍व की शक्ति होती तो तुम स्‍वयं इस फल को दुबारा पेड़ से लगा सकती थी।

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यह सुनकर द्रौपदी आश्‍चर्यचकित रह गई। उसने कहा- मैं पूरी तरह अपने पतियों के प्रति समर्पित हूं। पतियों के अलावा मैं किसी दूसरे पुरुष के बारे में मैंने कभी कल्‍पना ही नहीं की।
पेड़ ने कहा- तुम दूसरे पुरुष से प्‍यार करती हो।
द्रौपदी- बिल्‍कुल नहीं। मैं सिर्फ कृष्‍ण से प्रेम करती हूं। लेकिन वह भी एक दोस्‍त या एक भाई की तरह न कि प्रेमी की तरह।
पेड़ फिर भी नहीं माना। वह अपनी बात पर कायम रहा। उसने फिर कहा कि एक और व्‍यक्ति है जिससे वह प्‍यार करती है।

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तब जाकर द्रौपदी ने स्‍वीकार किया। उसने कहा, हां, मैं कर्ण से प्रेम करती हूं। मुझे इस बात का मलाल है कि मैंने उसे ठुकरा दिया था, क्‍योंकि वह शूद्र था। यदि मैंने उससे शादी की होती तो मैं जुए में हारी नहीं जाती, सरेआम बेइज्‍जत नहीं होती और मुझे कोई वेश्‍या नहीं कहता।
जब उसने अपनी गलती मान ली तो पेड़ ने कहा- अब तुम्‍हारे अंदर सतीत्‍व के गुण आ गए हैं। इस फल को दोबारा उसी स्‍थान पर लगा सकती हो।

द्रौपदी ने जो कुछ कहा उसे सुनकर उसके पतियों को धक्‍का लगा। भीम और अर्जुन तो इस बात को स्‍वीकार ही नहीं कर पा रहे थे कि उनकी पत्‍नी कर्ण से प्रेम करती है। लेकिन युधिष्ठिर ने इसे मान लिया। एक रात उन्‍होंने युधिष्ठिर को द्रौपदी के चरण स्‍पर्श करते हुए देखा तो उन्‍हें बड़ा आश्‍चर्य हुआ। छोटे भाइयों ने युधिष्ठिर से ऐसा करने का कारण पूछा। तब युधिष्ठिर आधी रात में सभी को बरगद के पेड़ के पास ले गए। उस पेड़ के नीचे नौ लाख देवियां थीं। उन्‍होंने देवी का आह्वान किया तब द्रौपदी उनके समक्ष प्रकट हुई। इसके बाद भीम और अर्जुन को अहसास हुआ कि द्रौपदी एक सामान्‍य स्‍त्री नहीं थी, बल्कि वह तो स्‍वयं देवी का एक रूप थी।

(Source: Mahabharata/Jaya – Draupadi’s confession)

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2 Comments

  1. यह बात मैंने पहले भी सुनी थी….मगर अधूरी…आज पूरी बात सुनने पर अच्छा लगा….इसे प्रस्तुत करने का तरीका नायाब है….बहुत ही खुब….

  2. क्या सचमुच में कर्ण से प्रेम करती थीं द्रौपदी?? इसकी सचाई जानने के लिए आप fundabook.com वेबसाइट पर प्रकाशित इस लेख को पढ़ सकते हैं https://goo.gl/RIwhLB

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