कर्ण को शाप नहीं मिला होता तो अर्जुन
कर्ण को शाप नहीं मिला होता तो अर्जुन

कर्ण को शाप नहीं मिला होता तो अर्जुन का काम तमाम था

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

कर्ण का बचपन अंगदेश में बीता था। कर्ण घर लाने के कुछ समय बाद अधिरथ और राधा ने उसका नामकरण किया। चूंकि वह जन्‍म से ही वसु (कवच और कुण्‍डल रूपी धन) धारण किए हुए था, इसलिए उन्‍होंने उसका नाम वसुसेन रखा। उसका एक और नाम था, वृप। कुछ लोग उसे सूतपुत्र भी कहते थे।

अधेड़ दंपती ने कर्ण को बड़े लाड-प्‍यार से पाला और पढ़ाया-लिखाया। उसे वेद-शास्‍त्र और अस्त्र-शस्‍त्र चलाने की शिक्षा दिलाई। अस्‍त्र-शस्‍त्र चलाने में कर्ण का कोई मुकाबला नहीं कर सकता था। प्राइमरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद अधिरथ ने कर्ण को हस्तिनापुर में द्रोणाचार्य के पास भेज दिया। वहां पाण्‍डव और कौरव राजकुमार भी पढ़ते थे। द्रोणाचार्य अर्जुन पर कुछ ज्‍यादा ही मेहरबान रहते थे। अर्जुन को लेकर कर्ण इन्सिक्‍योर था। इसलिए वह अर्जुन से आगे रहने के लिए बहुत मेहनत करता था और हमेशा सीखने की कोशिश में लगा रहता था।

कर्ण ब्रह्मास्‍त्र सीखना चाहता था। लेकिन द्रोणाचार्य को यह बात कैसे कहे, उसे इसका अवसर नहीं मिल रहा था। एक दिन द्रोणाचार्य को खुश देखकर उसने अपने मन की बात कह दी। वह समझ गए कि कर्ण उनके सबसे प्रिय शिष्‍य अर्जुन का काम तमाम करने के लिए ही ब्रह्मास्‍त्र सीखना चाहता है। इसलिए उन्‍होंने कर्ण को दो टूक जवाब दिया कि ब्राह्मण या तपस्‍वी क्षत्रिय के अलावा किसी और को ब्रह्मास्‍त्र पाने का अधिकार नहीं है। कर्ण को यह बात बहुत बुरी लगी। लेकिन वह कर भी क्‍या सकता था।

कर्ण में जिद, जुनून और जज्‍बा तीनों ही भरपूर था। लिहाजा एक दिन वह सीधे परशुराम के पास जा पहुंचा। उसने खुद को भार्गव ब्राह्मण बताते हुए बड़ी विनम्रता से अस्‍त्र विद्या सीखने की इच्‍छा प्रकट की। परशुराम जी ने ब्राह्मण मानकर उसे अपने पास रख लिया और हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने लगे। वह कर्ण के मधुर स्‍वभाव और लगन से इतने खुश हुए कि उनके पास जो भी दिव्‍यास्‍त्र थे या वह जो कुछ भी जानते थे, वो सब कर्ण को प्रयोग सहित बतला दिया। कर्ण की वीरता, धीरता, सेवा और तपस्‍या ने परशुराम को मोहित कर लिया था। वह कर्ण पर बहुत भरोसा करने लगे थे।

एक दिन कर्ण शिकार पर निकला। अचानक उसे लगा कि झाडि़यों में कोई हिरण है। उसने बाण चला दिया। उसने पास जाकर देखा तो पता चला कि वह किसी ब्राह्मण की गाय थी। अब तो कर्ण को काटो तो खून नहीं। वह जानता था कि ब्रह्म शाप बहुत खतरनाक होता है। उसने ब्राह्मण के बहुत हाथ-पैर जोड़े की एक गाय के बदले में वह उम्‍दा किस्‍म की हजारों गाय ले ले, लेकिन शाप न दे। वह ब्राह्मण को बेशुमार धन-दौलत, सैकड़ों गांव, नौकर-चाकर आदि भी देने को तैयार हो गया, लेकिन ब्राह्मण नहीं माना।

अंतत: वह कर्ण को शाप देकर ही शांत हुआ। ब्राह्मण ने कहा, ‘रे पापी, जिसे मारने के लिए तू यह अस्‍त्र विद्या सीख रहा है, उस पर इसका प्रयोग ही नहीं कर पाएगा। उससे लड़ते समय तेरे रथ का पहिया जमीन में धंस जाएगा।‘ शाप से कर्ण दुखी तो बहुत हुआ, लेकिन वह आश्रम लौटकर और तत्‍परता से युद्ध विद्या सीखने लगा। हालांकि बाद में परशुराम ने भी उसे शाप दिया। पशुराम को पता चल गया कि कर्ण क्षत्रिय था, लेकिन उसने खुद को ब्राह्मण बताया। इसलिए उन्‍होंने उसे शाप दिया कि जिस शत्रु को मारने के लिए तूने झूठ बोलकर अस्‍त्र विद्या हासिल किया, उसे मारते समय ये सारी विद्याएं भूल जाएगा। कर्ण ने बहुत हाथ-पैर जोड़े लेकिन परशुराम नहीं माने।

 

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