कर्ण के जन्‍म का राज सिर्फ एक दासी
कर्ण के जन्‍म का राज सिर्फ एक दासी

कर्ण के जन्‍म का राज सिर्फ एक दासी जानती थी

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

कुन्‍ती की एक साल की सेवा से खुश होकर दुर्वासा ने उसे एक मंत्र दिया था। इस मंत्र की खासियत यह थी कि जिस देवता को ध्‍यान कर वह मंत्र पढ़ती, वो उसके सामने प्रकट हो जाते। दुर्वासा के जाने के बाद कुछ दिन कुन्‍ती ने मंत्र पर ध्‍यान ही नहीं दिया। एक दिन कुन्‍ती के मन आया कि क्‍यों न दुर्वासा के दिए हुए मंत्र का परीक्षण किया जाए।

उस समय कुन्‍ती राजमहल में अपने कमरे में बैठी हुई थी और सूर्योदय हो रहा था। सूर्य की किरणें खिड़की से कमरे में आ रही थीं। कुन्‍ती सूर्य का तेज देखकर मुग्‍ध हो गई और सोचने लगी, ‘मेरा बेटा भी सूर्य की तरह तेजवान हो, दुनियाभर की स्त्रियों में मेरा नाम हो और मैं बहुत भाग्‍यशालिनी समझी जाऊं।‘

यह सोचकर उसने मंत्र पढ़कर सूर्य का ध्‍यान किया। सूर्य तत्‍काल प्रकट हो गए और बोले, ‘हे कल्‍याणी, तुमने पुत्र की कामना से मेरा आह्वान किया है। इसलिए मेरे वरदान से तुम्‍हारे गर्भ से एक बहुत प्रतापी पुत्र जन्‍म लेगा। वह तेज में मेरे समान होगा और जन्‍म से ही दिव्‍य कवच-कुण्‍डल धारण किए होगा।‘

यह सुनकर कुन्‍ती घबरा गई और माफी मांगने लगी। उसने कहा, देव, मैं तो बस मंत्र टेस्‍ट कर रही थी। मेरा इरादा आपको कष्‍ट देने का नहीं था। तब सूर्य ने कहा, मेरा वरदान झूठा नहीं हो सकता। तब जाकर कुन्‍ती नॉर्मल हुई।

यथासमय कुन्‍ती ने बिल्‍कुल वैसे ही बच्‍चे को जन्‍म दिया, जैसी उसने इच्‍छा की थी। नवजात शिशु दिव्‍य कवच और कुण्‍डल पहने हुए था। पहले तो कुन्‍ती बहुत खुश हुई, लेकिन दूसरे ही क्षण उसे ख्‍याल हुआ कि अगर उसके बिन ब्‍याही मां बनने की बात फैल गई तो उसकी और उसके खानदान की बहुत बदनामी होगी। दुर्वासा के दिए मंत्र और सूर्य के वरदान पर कोई विश्‍वास नहीं करेगा।

कुन्‍ती ने एक दासी को छोड़कर यह राज अभी तक किसी को बताया नहीं था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्‍या करे। तब सलाह लेने के लिए कुन्‍ती ने उसी दासी को बुलाया। दासी का कहना था कि बदनामी से बचना है तो बच्‍चे को नदी में बहा देना चाहिए। कुन्‍ती पहले इसके लिए तैयार नहीं हुई। तब दासी ने सब ऊंच-नीच समझाया तो लाचारी में उसकी बात माननी पड़ी।

प्‍लान के मुताबिक दासी एक संदूक ले आई। उसमें नरम बिछौना लगाकर बच्‍चे को लिटा दिया और संदूक को बंद कर दिया। इसके बाद संदूक को अच्‍छी तरह बंद किया और M-Seal लगाकर पूरी तरह पैक कर दिया ताकि उसमें पानी नहीं घुसे। अंत में बच्‍चे की सलामती की दुआ करते हुए भारी मन से कुन्‍ती ने संदूक को पानी में बहा दिया। वह बहुत रोई। बच्‍चे का मोह वह छोड़ नहीं पा रही थी।

कुन्‍ती ने शिशु को अश्‍व नदी में प्रवाहित किया था, जिसका उल्‍लेख महाभारत में चर्मण्‍वती की सहायक नदी के रूप में है। अश्‍व नदी से बहते-बहते संदूक चर्मण्‍वती, चंबल, यमुना और फिर गंगा में पहुंचा। गंगा की लहरों पर तैरता हुआ लकड़ी का बक्‍सा अंगदेश में सूतराज्‍य की चंपापुरी के पास पहुंचा, जहां धृतराष्‍ट्र का मित्र अधिरथ रहता था।

चंपापुरी में मौजूदा बिहार के मुंगेर और भागलपुर ज़िले आते थे। उस समय अंग महाजनपद की राजधानी चंपा थी। चंपा के कई नाम थे, जैसे- चंपानगर, चंपावती, चंपा मालिनी, चंपापुरी। यह गंगा और चंपा नदी के संगम पर बसी थी। 12वें जैन तीर्थंकर वासुपूज्‍य का जन्‍म और मोक्ष, दोनों चंपा में ही हुआ था। चंपा समृद्ध नगर और व्यापार का केंद्र भी था। चंपा के व्यापारी समुद्रमार्ग से व्यापार के लिए भी प्रसिद्ध थे।

खैर, कहानी आगे बढ़ाते हैं। अधिरथ की पत्‍नी का नाम राधा था। रूप और गुण में वह अद्वितीय मानी जाती थी। लेकिन दोनो के कोई संतान नहीं थी। जिस समय संदूक तैरता हुआ सूतराज्‍य (शूद्रों का इलाका) में गंगा के किनार पर आ लगा, उस समय पति-पत्‍नी नदी किनारे टहल रहे थे। संदूक पर दूब, अक्षत, कुंकुम के टीके जैसी मांगलिक चीजें देखकर दोनों ने उसे पानी से निकाल लिया। इसके बाद फौरन औजार मंगाकर उसे खोला। ढक्‍कन खुलते ही उसमें शिशु कर्ण को देखकर दोनों चकरा गए। कर्ण की सुंदरता, उसके तेज और कवच-कुण्‍डल देखकर अधिरथ ने कहा कि यह कोई देवकुमार लगता है। उसने ईश्‍वर को धन्‍यवाद दिया बच्‍चे को अपने घर ले जाकर बड़े प्‍यार से पालने लगे।

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