कसम से जिंदगी लकड़बग्‍घे जैसी हो गई है
कसम से जिंदगी लकड़बग्‍घे जैसी हो गई है

कसम से जिंदगी लकड़बग्‍घे जैसी हो गई है

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

जिस घड़ी से 500 और 1000 के नोटों को बंद करने की घोषणा हुई है, उस घड़ी से जिंदगी और बेरहम हो गई है। जेब में 500 और 1000 के नोट होने के बावजूद हालत भिखारियों से बदतर है।दुकानदार, रिक्‍शा-ऑटो वाला, दूधवाला, पेपर वाला… सब के सब उसी रात से अंतर्यामी हो गए। कसम से जिंदगी लकडबग्‍घे सी हो गई है।

सुबह से रात दो बजे तक इसी फिराक में घूमता रहता हूं कि कोई एटीएम गलती से एक ही नोट निकाले तो सही। भाई सा’ब सात दिन गुजर गए हैं एटीएम परिक्रमा करते करते। चार बार बैंक और एटीएम के लाइन में लगने के बावजूद लक्ष्‍मी पकड़ में नहीं आई। उस समय नेपथ्‍य में मुकेश की आवाज में एक ही गाना चलता है… मेरी बदनसीबी मुझसे पहले यहां चली आई।

बस खड़े हो जाइये, वहीं से लाइन शुरू

हद तो शनिवार को हो गई। दिल्‍ली में वेस्‍ट विनोदनगर के मण्‍डावली इलाके में एक बैंक का एटीएम है। उसी के पास सिगरेट और अगड़म-बगड़म चीजों की एक दुकान। दुकान पर खड़े हों तो लगता है कि एटीएम में जाने के लिए इंतजार कर रहे हैं। बहरहाल, सिगरेट लेने के बाद दुकानदार ने दो रुपये का जो सिक्‍का लौटाया वह लुढ़कर कर एटीएम में चला गया। मैं उसका पीछा करते हुए अंदर घुसा। उसे खोजने लगा। इस बीच, दुकान पर दो-तीन लोग और आ गए। दुकान वाले ने मेरी लाचारी देखकर बाहर से आवाज दी- भाई साहब, मिला क्‍या? मैंने कहा- हां। वहां खड़े लोगों को लगा एटीएम में पैसा है। महज 5-7 मिनट के अंदर 25 लोग लाइन में खड़े हो गए। दुकानदार सबसे कहता रहा कि भइया एटीएम में पैसा नहीं है। लेकिन लोगों ने उसे डॉंट कर चुप करा दिया कि अभी एक भाई साहब निकाल कर ले गए हैं।

कैश की अफवाह उड़ाई और लोग इकट्ठा

यह सीन देखकर अपनी खुराफाती खोपड़ी में एक आइडिया कौंध गया। सोचा कि जरा देखें तो मैं ही अधीर हूं या लोग मुझसे भी ज्‍यादा अधीर हैं। दिन के बारह बजे घर के पास एक एटीएम की सीढ़ी पर बैठ गया। तब तक किसी ने नहीं देखा। एक मित्र उधर से गुजरे तो पूछ बैठे- बाबा, एटीएम के बाहर धरने पर बैठे हैं क्‍या? लगे हाथ हमने भी छक्‍का मार दिया। बोला- हां। कैश वैन आ रही है, चेस्‍ट में नोट डालने। वह भी लकड़बग्‍घा बने एटीएम-एटीएम घूम रहे थे। मित्र को लगा …वाह! आज तो शर्तिया धन मिल जाएगा। मेरा नंबर दूसरा ही है। अब वह मेरे बाजू में बैठे हुए थे। हमारी बातचीत सुनकर कुछ और लोग पूछताछ करने पहुंच गए। अब हम एन्‍क्‍वायरी काउंटर के रूप में वहां स्‍थापित थे।

… और हम निकल लिए

आधे घंटे में बात फैल गई और करीब 50-60 लोग लाइन में खड़े हो गए। सब लोग पूछ रहे थे कब तक कैश वैन आएगी। हमने एक बजे कहा था। अब मेरी धड़कन बढ़ने लगी थी। मैं मित्र के कान में फुसफुसाया- जल्‍दी से निकल लो यहां से। वरना जूते पड़ने वाले हैं। उसने पूछा- क्‍या बात हो गई। मैंने कहा- बिना कान-पूंछ हिलाए निकल लो बस। बाद में पूछना। हमने वहां खड़े लोगों से कहा- भार्इ, जरा देखना। हम अभी आए। दूर जाकर हमने मित्र से कहा- देखा, अफवाह आंखों के सामने कितनी तेज रफ्तार से दौड़ी। मैं तो तुमसे मजे ले रहा था। क्‍या मालूम थी, जिंदगी इस कदर मजे लेगी।

बदनसीबी खींच कर ले गई

मैं पटपड़गंज से बारहखंभा रोड तक एटीएम टटोलता रहा। चार घंटे बाद लौटा तो देखा, उसी एटीएम के पास लंबी लाइन। सच कहूं तो मेरी हवा टाइट हो गई। लगा कि अब जूते पड़ने ही वाले हैं। मारे डर के भाग कर गली में घुसा ही था कि एक सज्‍ज्‍न ने पीछे से आवाज दी। रुका तो करीब आकर बोले- भाई साहब, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। कैश वैन ठीक एक बजे आ गई थी। आप दोनों के बाद मेरा ही नंबर था। बहुत देर आपका इंतजार किया, लेकिन आप नहीं आए। वह मुझे दुआएं दे रहा था और मैं खुद को कोस रहा था। कमबख्‍त बदनसीबी यहां से भी खींच कर ले गई।

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