सांड से मार खाने के लिए इतना बवाल!
सांड से मार खाने के लिए इतना बवाल!

सांड से मार खाने के लिए इतना बवाल!

0
 नुक्‍कड़ टाइम्‍स। तमिलनाडु में बीते कई दिनों से जिस जल्‍लीकट्टू खेल के बवाल मचा हुआ है, उसे गंवई शैली में सांड का पीछे पड़ना कहा जाता है। अपना देश भी गजब का है। उत्‍तर भारत में यही सांड जब स्‍वेच्‍छा से किसी के पीछे दौड़े तो मार्केट में हड़कंप मंच जाता है। लेकिन दक्षिण में उसी सांड को अपने पीछे दौड़ाने के लिए लोग उसकी आरजू-मिन्‍नतें करते हैं।
मजेदार बात तो यह है कि पशु अधिकारों की हिमायती संस्‍थाएं भी इस बवाल में कूद पड़ी हैं। इनका कहना है कि यह खेल जानवरों के लिए हानिकारक है। समझ में नहीं आता कि इस खेल में सांड ही इनसान को गोत-गोत कर मारता है, फिर भी जान का खतरा उसी को  कैसे है। गोया गुहार तो इनसानों को लगानी चाहिए, जिसे बलिष्‍ठ सांड सींग घुसेड़-घुसेड़ कर मारता है। उठाकर पटक देता है, लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की। उल्‍टा सुप्रीम कोर्ट ने जब इस खेल पर ही पाबंदी लगा दी तो इसे दोबारा शुरू करने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं।





पूरा रायता यूपीए का फैलाया हुआ

 जल्‍लीकट्टू पर पूरा रायता यूपीए सरकार का फैलाया हुआ है। सबसे पहले 2011 में इसी ने इस खेल को लेकर अधिसूचना जारी की थी। मौजूदा सरकार ने तो इसमें सिर्फ संशोधन किया है। इसने तो पिछले साल जनवरी में ही इस पर से पाबंदी हटा ली थी। इसी बात पर पेटा वाले यह कहते हुए मैदान में कूद गए कि यह तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्‍लंघन है।

जल्‍लीकट्टू है क्‍या 

जल्‍लीकट्टू तमिल के दो शब्‍दाें से बना है। जल्‍ली का मतलब होता है सोने या चांदी के सिक्‍के और कट्टू का अर्थ होता है बांधना। यानी सांड के सींग में सिक्‍के बांधने का खेल। अगर यही खेल उत्‍तर भारत में खेला जाता तो इसका नाम ‘ए बैल हमरा मार’ होता। इस खेल में सांड को पकड़ कर उसके सींग में सिक्‍कों की पोटली बांधने वाले बांके वीर को बाकायदा इनाम दिया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल चार दिनों तक मनाया जाता है। त्‍योहार के तीसरे दिन यानी मट्टू पोंगल के दिन इस खेल का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि करीब 2500 साल पहले तमिलनाडु में इस खेल की शुरुआत हुई थी। अब इतनी प्राचीन संस्‍कृति को कोई कैसे छोड़ दे। सोचने वाली बात है कि नहीं।
Share.

Leave A Reply

Powered by virtualconcept.in