सबको शाप देने वाले दुर्वासा ने
सबको शाप देने वाले दुर्वासा ने

सबको शाप देने वाले दुर्वासा ने कुन्‍ती को वरदान क्‍यों दिया?

3

नुक्‍कड़ टाइम्‍स

कुन्‍ती के पालक पिता कुन्तिभोज धर्मात्‍मा थे। बचपन से ही कुन्‍ती ने अपने पिता को साधु-संतों की सेवा करते हुए देखा तो उसके मन में भी साधु-संतों के लिए श्रद्धा भाव पैदा हो गया। कुन्‍ती में एक खासियत यह भी थी कि वह सारे काम धर्म के मुताबिक ही करती थी।

एक दिन कुन्तिभोज के यहां सबसे खतरनाक ऋषि दुर्वासा पधारे। उन्‍हें कब, क्‍यों और किस बात पर गुस्‍सा आ जाए… यह बात शायद वह खुद भी नहीं जानते होंगे। वह एकमात्र ऐसे ऋषि थे जिन्‍होंने बात-बात पर स्‍वर्ग से लेकर धरती तक थोक में श्राप दिए। लेकिन उन्‍होंने कुन्‍ती को वरदान दिया।

दुर्वासा ने कुन्तिभोज से कहा, राजन्! तुम्‍हारी धर्मशीलता की प्रशंसा सुनकर आया हूं। कुछ दिन यहां रहकर भिक्षा से निर्वाह करना चाहता हूं। लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं जिन्‍हें तुम्‍हें मानना होगा। मुझे यहां न तो कोई डिस्‍टर्ब करे और न ही कोई मेरी इच्‍छा के विरुद्ध काम करे। मैं जैसे चाहूं, वैसे रहूं। न तो मेरे काम में बाधा हो और न ही मेरे कहीं आने-जाने पर रोक-टोक हो।

कुन्तिभोज को क्‍या पड़ी थी जो कुछ बोलकर अपनी फजीहत कराते। उन्‍होंने हाथ जोड़कर कहा, भगवन्, मेरे अहोभाग्‍य जो आपने आकर दर्शन दिए और इस घर को पवित्र किया। आप यहां इत्‍मीनान से रहिए। सारे काम आपकी इच्‍छानुसार ही किए जाएंगे। आपको शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। आपकी सेवा में मैं अपनी बेटी पृथा को लगा दूंगा। मुझे पूरा विश्‍वास है कि वह आपको किसी तरह का कष्‍ट नहीं होने देगी।

इतना कहकर कुन्तिभोज ने पृथा को बुलवाया और उससे कहा, ये महातेजस्‍वी महात्‍मा हमारे घर में रहेंगे। ये जहां चाहे जाएं, जो चाहे करें। न तो कोई इन्‍हें रोके और न इनकी इच्‍छा के विरुद्ध कोई काम करे। अगर तुमने अपने सेवा-सत्‍कार से इन्‍हें खुश कर दिया तो हम सब का भला होगा, वरना ये शाप देकर सबको भस्‍म कर देंगे।

पृथा बोली, पिताजी आप टेंशन न लें। इनकी सेवा में कोई कमी नहीं होने दूंगी। फिर भी राजा ने दुर्वासा से कहा, ब्राह्मण देवता, मेरी बेटी आपका पूरा ख्‍याल रखेगी। लेकिन अनजाने में इससे कोई गलती हो जाए तो इसे माफ कर दीजियेगा। ऋषि बोले, तुम टेंशन फ्री रहो।

दुर्वासा एक साल तक कुन्तिभोज के यहां रहे। इस दौरान राजा रोज शाम को पृथा अर्थात् कुन्‍ती से पूछते, बेटा, महात्‍मा जी तुम्‍हारी सेवा से संतुष्‍ट हैं या नहीं? कुन्‍ती रोज यही जवाब देती, हां, पिताजी। संतुष्‍ट हैं।

दुर्वासा जब तक कुन्तिभोज के यहां रहे, उन्‍होंने हर तरह से कुन्‍ती की श्रद्धा-भक्ति की जांच की। कभी वह शाम को लौटने को कहकर जाते और आधी रात को आते। तब तक बेचारी भूखी-प्‍यासी जागकर उनके आने का इंतजार करती रहती। कभी-कभी तो ऋषिवर बिना बताये कहीं चले जाते और दो-तीन दिन तक नहीं आते थे। फिर अचानक आ धमकते और कुन्‍ती से ऑफ सीजन फल और सब्जियां मांगते।

कुन्‍ती ने सारा इंतजाम कर रखा था। उसे कभी यह नहीं कहना पड़ा कि अभी इस चीज का मौसम नहीं है। इसके बावजूद दुर्वासा उसकी सेवा में दोष निकालते और बेवजह उसे डांटते-फटकारते। लेकिन कुन्‍ती ने न तो कभी धीरज छोड़ा ओर न ही अपने मन में कोई गलत विचार आने दिया। वह और ज्‍यादा उत्‍साह से उनकी सेवा करने लगती। आखिर में एक दिन दुर्वासा वहां से चलने लगे तो उन्‍होंने कुन्‍ती को पास बुलाकर ऐसा वर मांगने को कहा जो अन्‍य स्त्रियों को दुर्लभ हो।

कुन्‍ती बोली, आप मुझ पर प्रसन्‍न हैं तो मुझे और क्‍या चाहिए? तब दुर्वासा ने कहा, अच्‍छा ठीक है। मैं तुम्‍हें एक ऐसा मंत्र देता हूं जिसकी सहायता से तुम जिस देवता को याद करोगी, वही सेवकों की तरह तुम्‍हारे सामने आ जाएगा। फिर तुम जो कहोगी, वही करेगा। कुन्‍ती को डर हुआ कि बार-बार मना करने से कहीं ऋषि क्रोधित होकर शाप न दे दें। लिहाजा जब तक वे मंत्र देते रहे, कुन्‍ती चुपचाप सिर झुकाए खड़ी रही। इसके बाद दुर्वासा राजा कुन्तिभोज के पास गए और कुन्‍ती की बहुत प्रशंसा की। फिर अंतर्धान हो गए।

Share.

3 Comments

  1. Saumya sudershna on

    Bahut umda baba… Aapki stories bahut unique hoti hain. Chahe wo hard story ho ya feature writing, sabme kuchh naya padhne ko zarur milta hai. Proud of you. All the best for future..

Leave A Reply

Powered by virtualconcept.in