मन्‍नारगुड़ी माफिया किसी के हाथ नहीं
मन्‍नारगुड़ी माफिया किसी के हाथ नहीं

मन्‍नारगुड़ी माफिया किसी के हाथ नहीं आता

0

नुक्‍कड़ टाइम्‍स। जयललिता 1991 में जब पहली बार मुख्‍यमंत्री बनीं तो वी.के शशिकला का परिवार, जो मन्‍नारगुड़ी माफिया के नाम से कुुख्‍यात है, सत्ता के काफी करीब आ गया। राज्‍य की सत्ता में इन्‍होंने अपनी मजबूत पकड़ बना ली थी। लेकिन सरकार पर भ्रष्‍टाचार के आरोपों, आय से अधिक संपत्ति और 8.53 करोड़ रुपये के टीवी घोटाले में फंसने के बाद 1996 के चुनाव में जयललिता हार गईं और एम करुणानिधि की अगुआई में द्रमुक की सरकार बनी।

जयललिता की हार की सबसे बड़ी वजह यह थी कि सरकार पर मन्‍नारगुड़ी माफिया का शिकंजा था। यह माफिया जयललिता को हमेशा घेरे रखता था। यहां तक की कि किसी को उनसे मिलने नहीं दिया जाता था। सिर्फ गिने-चुने लोग ही जयललिता से मिल सकते थे। यहां तक की जरूरी काम के लिए भी अधिकारी इंटरकॉम पर ही उनसे बात करते थे। अधिकारियों और मंत्रियों को शशिकला की तरफ से निर्देश मिलते थे।

जब करुणानिधि की सरकार बनी तो जयललिता के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई। उनके बंगले और ठिकानों पर छापेमारी की गई। इस दौरान जयललिता के चेन्‍नई और हैदराबाद स्थित घरों से भारी मात्रा में संपत्ति और जेवरात बरामद हुए। इनमें 56 करोड़ की संपत्ति के अलावा 30 किलो सोना जिसमें 400 जोड़ी कंगन, 500 किलो चॉंदी, 100 से अधिक बेशकीमती घडि़यां, बेशकीमती रत्‍न, 10,000 महंगी साडि़यां और 250 जोड़ी ब्रांडेड विदेशी सैंडल शामिल थे।

इन मामलों में जयललिता को जेल भी जाना पड़ा। करुणानिधि सरकार की सख्‍ती के कारण राजनीतिक रूप से जयललिता कमजोर पड़ गई थीं। 1998 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में एनडीए की सरकार बनी तब जयललिता उसमें सहयोगी बन गईं। उस समय प्रमोद महाजन और ब्रजेश मिश्र एनडीए सरकार के संकटमोचक माने जाते थे। दोनों ने शशिकला और उनके मन्‍नारगुड़ी माफिया से फायदा उठाने की कोशिश की। लेकिन प्रमोद महाजन जैसे मंझे हुए राजनीतिज्ञ भी शशिकला के परिवार को पटाने में सफल नहीं हुए, क्‍योंकि उन लोगों का लगाव पैसे से अधिक था।

इसके बाद महाजन ने शशिकला और उनके परिवार को नजरअंदाज करना शुरू किया, जो खतरनाक साबित हुई। शशिकला ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया। अब दिल्‍ली की उठापटक की जानकारी उन्‍हें सीधे कांग्रेस आलाकमान से मिलने लगी। 1999 में जयललिता को कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी से मिलाने के लिए शशिकला ने दिल्‍ली के अशोका होटल में चाय पार्टी रखी। इसके मेजबान जनता पार्टी के अध्‍यक्ष सुब्रमण्‍यम स्‍वामी थे जो वाजपेयी से काफी नाराज चल रहे थे। वाजपेयी ने उन्‍हें कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया था। यह चाय पार्टी राजनीतिक भूचाल साबित हुई। अन्‍नाद्रमुक ने समर्थन वापस ले लिया और वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिर गई।

इसके बाद राज्‍य में जयललिता सरकार की सत्‍ता में वापसी हुई, लेकिन आय से अधिक संपत्ति मामले में उन्‍हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। 2003 में हाईकोर्ट के आदेश पर वह फिर मुख्‍यमंत्री बनीं, लेकिन 2006 में चुनाव हार गईं। इस राजनीति उठापटक के दौरान शशिकला हमेशा उनके साथ रहीं।

Share.

Leave A Reply

Powered by virtualconcept.in