द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद मसाला
द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद मसाला

द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद मसाला फिल्‍मों का दौर शुरू हुआ

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

1897 से शुरू मूक फिल्‍मों का सिलसिला 1930 तक चला। इन 34 वर्षों में करीब 1200 फिल्‍में रिलीज हुईं। हालांकि अब इनमें से बहुत कम फिल्‍मों के प्रिंट ही उपलब्‍ध हैं। सरकारी अनदेखी और सही रखरखाव के अभाव में ये धरोहर गुम हो गए। बहरहाल, दादा साहब फाल्‍के की फिल्‍म ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ को दर्शकों से जबरदस्‍त रिस्‍पॉंस मिलने के बाद एक तरह से फिल्‍म निर्माण के क्षेत्र में बाढ़ सी आ गई थी।

भारत की पहली बोलती फिल्‍म ‘आलम आरा’ थी। इसका निर्माण आर्देशिर ईरानी ने किया था। यह फिल्‍म 14 मार्च, 1931 को रिलीज हुई थी। उसी समय पहली दो दक्षिण भारतीय फिल्‍मों को भी थियेटर में रिलीज होना था। इनमें एक तेलुगु फिल्‍म ‘प्रह्लाद’ और दूसरी तमिल फिल्‍म ‘कालिदास’ थी। ये फिल्‍में 31 अक्‍तूबर, 1931 को रिलीज हुईं। इसी समय बांग्‍ला में भी पहली फिल्‍म रिलीज हुई। इसका नाम ‘जमाई शास्‍ती’ था। यह वो दौर था जब देश में फिल्‍में बहुत तेजी लोगों को आकर्षित करने लगी थीं। फिल्‍मी कलाकारों की मांग बहुत बढ़ गई थी और उन्‍हें अच्‍छा मेहनताना भी मिलने लगा था।

साउंड तकनीक के विकास के साथ फिल्‍मों में संगीत का भी इस्‍तेमाल होने लगा। धुन बनने लगी तो फिल्‍मों में डांस का तड़का भी पड़ने लगा। 1930 के दशक में ‘इंद्र सभा’ और ‘देवी देवयानी’ आई जिसमें पहली बार गाने और डांस के सीन फिल्‍माए गए थे। इस तरह द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद भारतीय सिनेमा में कमर्शियल यानी मसाला फिल्‍मों की शुरुआत हुई। इनमें डांस, संगी, ड्रामा, कॉमेडी और रोमांस था जो दर्शकों को लुभा रहा था। 1940 के दशक के दौरान भारतीय सिनेमा में दक्षिण भारतीय फिल्‍में अपार प्रसिद्धि हासिल कर चुकी थीं।

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