क्‍या आप जानते हैं भारत की पहली फिल्‍म
क्‍या आप जानते हैं भारत की पहली फिल्‍म

क्‍या आप जानते हैं भारत की पहली फिल्‍म कैसी थी?

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

दुनिया का सबसे पुराना फिल्‍म उद्योग भारत में है। भारत आने के करीब छह माह बाद लुमियर ब्रदर्स ने 28 दिसंबर, 1895 को अपने पहले पब्लिक शो का आयोजन किया। लुमियर ब्रदर्स फ्रेंच सिनेमैटोग्राफर थे। मुंबई में उनके इस चलचित्र को लेकर खलबली मच गई थी। अखबारों ने इसे अनोखी खोज करार देते हुए इसकी खूब प्रशंसा की थी।

7 जुलाई, 1896 को लुमियर के सहायक मारियस सेस्टियर ने मुंबई के वाटसंस होटल में पहली फिल्‍म (चलचित्र/सिनेमा) शो का आयोजन किया। यह शो एक घंटे से कम का था। फिल्‍म में छह चीजें दिखाई गईं थीं। इसमें छह दृश्‍य थे। इनके नाम थे- Entry of Cinematographe, The Sea Bath, Arrival of a Train, A Demolition,  Ladies and Soldiers on Wheels and Leaving the Factory. यह फिल्‍म मूक थी और इसकी अवधि दस मिनट थी। इस तरह मुंबई में पहली फिल्‍म रिलीज हुई।

हालांकि यह शो आम लोगों के लिए नहीं था, क्‍योंकि वाटसंस होटल के दरवाजे रईसों के लिए ही खुले थे। उस जमाने में वाटसंस होटल में फिल्‍म के चार शो के लिए दर्शकों से एक रुपया लिया गया। टिकट के बावजूद इस फिल्‍म को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ उमड़ आई थी। मजेदार बात यह है कि इस फिल्‍म का प्रचार टाइम्‍स ऑफ इंडिया में दिखा था। 7 जुलाई को इस अखबार के माध्‍यम से लोगों को लुमियर ब्रदर्श की चलती तस्‍वीरें देखने का आमंत्रण दिया गया था। अखबार ने इसे ‘दुनिया का आश्‍चर्य’ बताया था।

लुमियर ब्रदर्स की दूसरी फिल्‍म 14 जुलाई 1896 को रिलीज हुई। फिल्‍म मुंबई के ही नॉवेल्‍टी थियेटर में प्रदर्शित हुई। इस बार एक दिन में चौबीस फिल्‍में दिखाई गईं। इनमें A Stormy Sea और The Thames at Waterloo Bridge प्रमुख थीं।

इसके बाद 1899 में हरिश्‍चंद्र भटवाडेकर ने दो लघु फिल्‍में बनाईं। इन्‍हें एडिसन के प्रोजेक्टिंग किनीटोस्‍कोप के जरिये दिखाया गया था। किनीटोस्‍कोप एक ऐसा उपकरण था जिसमें छोटा छेद होता था। इस छेद के जरिये ही तस्‍वीरें देखी जा सकती थीं। इसके बाद शुरुआती दो दशकों तक यह सिलसिला चलता रहा। इसमें हीरालाल सेन और एफ.बी थानावाला, जे.एफ मदान और अब्‍दुल्‍लाह युसूफ अली और अन्‍य लोगों ने भी हाथ आजमाया। लेकिन 1913 तक भारतीय फिल्‍म की पब्लिक स्‍क्रीनिंग नहीं हुई थी।

इसके बाद दादा साहब फाल्‍के ने इस क्षेत्र में कदम रखा। मई 1913 को उन्‍होंने पहली मूक फिल्‍म ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ बनाई। सही मायने में बंबई में फिल्‍म उद्योग की नींव इसी फिल्‍म से पड़ी। 1920 तक भारतीय सिनेमा समाज का अंग बन गया था।

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