हीरोइन तैयार नहीं हुई तो हीरो को बना
हीरोइन तैयार नहीं हुई तो हीरो को बना

हीरोइन तैयार नहीं हुई तो हीरो को बना दिया लड़की

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

1895-96 में लुमियर ब्रदर्स द्वारा मुंबई में फिल्‍म रिलीज के बाद भारत में खलबली मच गई थी। इसी के बाद 1898 में प्रोफेसर स्‍टीवेंसन ने कोलकाता के स्‍टार थियेटर में एक शो किया। इस शो को भारतीय सिनेमैटोग्राफर हीरालाल सेन ने स्‍टीवेंसन के कैमरे से रिकॉर्ड किया। इसमें शो के कुछ दृश्‍यों को चलती हुई तस्‍वीर (Motion picture) के रूप में फिल्‍माया गया, जिसे The Flowers of Persia नाम दिया गया।

1899 में एच.एस भटवाडेकर ने एक फिल्‍म बनाई जिसका नाम था The Wrestlers। किसी भारतीय द्वारा बनाई गई यह पहली फिल्‍म थी। इसमें मुंबई के हैंगिंग गार्डन में होने वाले दंगल यानी कुश्‍ती के दृश्‍य को फिल्‍माया गया था। भारत की पहली डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍म भी यही है। रोचक बात यह है कि उनके पास अपना कैमरा नहीं था। बस एक प्रोजेक्‍टर था। इसलिए वह लंदन गए और तीन मिनट के सिर्फ दो दृश्‍य शूट किए। इनके टाइटल थे ‘दो पहलवानों की कुश्‍ती’ और ‘बंदर को नचाता हुआ मदारी’, जिस उन्‍होंने 1889 में रिलीज किया था। हालांकि अब तक ये फिल्‍में सामान्‍य लोगों से दूर ही थीं और जिस तरह अभी फिल्‍में रिलीज होती हैं, उस समय नहीं हुई थीं।

पहली फिल्‍म मराठी में बनी

18 मई 1912 को देश में मराठी भाषा में पहली फिल्‍म ‘श्री पुंडलिक’ कोरोनेशन थियेटर में रिलीज हुई। इसके निर्माता दादा साहेब टोर्ने थे। यह एक पौराणिक फिल्‍म थी जो महाराष्‍ट्र के एक संत के जीवन पर आधारित थी। मुंबई के एन.जी. चित्रे और स्‍टीवेंसन ने संयुक्‍त रूप से इसका निर्माण किया था। लेकिन पहली फुल लेंथ फिल्‍म भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्‍के ने बनाई। उन्‍होंने 1913 में पहली फिल्‍म ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ बनाई। वह देश के पहले फिल्‍म निर्माता थे जिन्‍होंने संस्‍कृत महाकाव्‍यों के आधार पर मराठी में इस फिल्‍म का निर्माण किया।

महिला की भूमिका में पुरुष

भारतीय सिनेमा के इतिहास में फिल्‍म ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ मील का पत्‍थर साबित हुई। यह पहली कमर्शियल फिल्‍म थी। इस फिल्‍म की अपार सफलता ने लोगों के लिए फिल्‍म निर्माण के रास्‍ते खोल दिए। दिलचस्‍प बात यह कि इस फिल्‍म में महिला की भूमिका के निभाने के लिए फाल्‍के को कोई महिला नहीं मिली। उन दिनों सिनेमा को सम्‍मान की नजर से नहीं देखा जाता था, इसलिए कोई महिला इसके लिए तैयार नहीं हुई। पहली बार महिला की भूमिका एक पुरुष सालुंके ने, जबकि राजा हरिश्‍चंद्र की भूमिका डी.डी. ढाबके ने निभाई। 1 जनवरी, 1900 को नॉवेल्‍टी थियेटर में दूसरी मूक फिल्‍म रिलीज हुई। इसमें भारतीय नृत्‍यांगना फातिमा और एक अंग्रेज टैवेलो ने भूमिका निभाई। फिल्‍म पूरी करने के लिए ब्रिटेन से फिल्‍म रील के कुछ कच्‍चे माल भी आयात किए गए थे। इन्‍हें संपादित करने के बाद किसी तरह उन टुकड़ों को एक लघु फिल्‍म के रूप में जोड़ा गया।

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