उधार की पगड़ी पर राजसी ठाठ
उधार की पगड़ी पर राजसी ठाठ

उधार की पगड़ी पर राजसी ठाठ

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स, राकेश क्रान्ति। मुझे दूर के एक रिश्‍तेदार की बारात में जाना था। बन-ठन कर मैं सबसे पहले बस के पास जाकर खड़ा हो गया। फिर भी मुझे सीट अंदर नहीं, बल्कि बस की छत पर मिली। परिवार के नजदीकी लोगों ने सारी सीटें लूट लीं। वैसे भी दूर के रिश्तेदार की परवाह कौन करता है। जब बारात वधु पक्ष के दरवाजे पर पहुंची तो खातिरदारी वीवीआईपी जैसी हुई। पहले तो मुझे कुछ समझ में ही नहीं आया कि हो क्‍या रहा है।  लेकिन जल्‍द ही समझ आ गया कि बेइज्‍जती के बाद इज्‍जत अफजाई की वजह वह साफा था जो मेरे सिर पर टिका हुआ था। तब समझ में आया कि इस संसार में कपड़ों की जितनी कद्र है, इनसान की नहीं।

बारात जब विवाह समारोह के गेट पर पहुंचा तो लड़की वाले लाइन में खड़े थे। देखते ही बोले- आप कहां पीछे रह गए। मैंने पीछे मुड़कर देखा, कोई नहीं था। फिर समझा, मुझसे ही पूछ रहे हैं। किसी ने सिर झुकाया, किसी ने हाथ मिलाया और किसी ने गले से लगाया। आगे बढ़ा तो सफेद शर्ट, काली पैंट और नीली ब्‍लेजर पहने लड़कों ने घेर लिया। सबने अपनी ट्रे आगे सरका दी। बोले- सर, कुछ लीजिए। फिर क्या था। एक झटके में दो गिलास जूस, दो गिलास कोल्ड ड्रिंक, एक गिलास लस्सी और एक गिलास जलजीरा गटक गया।

फिर एक वेटर सादर बैंक्‍वेट हॉल के अंदर ले गया। शानदार लॉन में खास तरह के व्यंजनों की दूर तक स्टॉल सजी थी। वेटर ने एक टेबल पर बैठाकर बड़ी विनम्रता से पूछा- क्या लेंगे, सर। कुछ समझ नहीं आया तो बोल दिया- बढ़िया-बढ़िया चीज ले आओ। वेटर ने चुस्ती दिखाई और दस मिनट में पूरी टेबल व्यजंनों से सजा दी। क्या खाऊं,
क्या छोड़ू-समझ नहीं आया। समझ में तो यह भी नहीं आ रहा था कि वहां बेइज्‍जती हुई और यहां इतनी खातिरदारी… अचानक यह कैसा चमत्‍कार?

बाराती तो 4 बस, 2 कैंटर, 12 बोलेरो, 3 सूमो में भरकर आए थे। मैं सोच ही रहा था, तभी वेटर बोला- सर, कुछ शगुन तो दो। मैंने पूछा- मैं क्यों दूं। दूल्हे से मांग। उसके बाप से मांग। उसके चाचा-ताऊ से मांग। फिर वह बड़े कॉन्फिडेंस से बोला- आप भी तो दूल्हे के परिवार से हो। मैंने पूछा- किसने कहां। वो बोला- आपके सिर पर साफा है, साहब। इतनी शादियों में अपनी सेवाएं दे चुका हूं। मुझे पता नहीं क्या, बारात में साफे वाले खास होते हैं।

मैंने पूछा-तो? वह बोला- खातिरदारी करने का 500 रुपये का इनाम तो बनता है। मैंने झट से पगड़ी उतारी। उसे कुर्सी पर बैठाकर साफा उसके सिर पर टिका दिया। फिर कहा- अब साफा तेरे सिर पर है। तू बता क्या खाएगा। मैं लेकर आता हूं। 500 छोड़, 50-100 रुपये ही दे देना। इतना सुनते ही उसने झट से साफा उतार कर टेबल पर रखा और वहां से खिसक गया। अब मेरी समझ में आया कि ये साफा मेरी इज्‍जत करा रहा है। फिर क्या था। साफा पहन कर हर स्टॉल पर गया। सारे मुझे देखते ही भीड़ को नजरअंदाज कर पूछते- यस सर, यस सर। मेरे आर्डर पर खासतौर पर प्लेट तैयार करते।

पंजाबी ढाबे वाली स्टॉल पर जाकर दाल में देसी घी का तड़का लगवाया और देसी घी-मक्खन से मचमच वाली रोटी खाई। खैर, मैं काले अंगूर से भरी प्लेट का मजा उठाते हुए आगे बढ़ा तो पांच-छह जान-पहचान वाले मिल गए। सारे पी कर टुन्‍न थे। जिद पर अड़े थे कि जब तक आइसक्रीम नहीं मिलेगी, नहीं खाएंगे। मैंने कहा-तो स्टॉल से ले आओ। वे बोले- खत्म हो चुकी। मैंने एक वेटर को बुलाकर पूछा तो ऐसा ही जवाब मिला। नाफरमानी का जवाब सुनकर मुझे गुस्सा आ गया। लेकिन तत्‍काल याद आया, साफा तो उतार कर कुर्सी के नीचे रख चुका हूं।

साफा उठाकर मैंने फिर से सिर पर सजाया और आइसक्रीम की स्टॉल पर जा पहुंचा। आइसक्रीम मांगी तो स्टॉल वाला पूछा- कौन सी खाएंगे और चार-पांच वैरायटी गिना दिए। मैंने कहा- भाई, पूरा बॉक्स दे दो और एक वेटर को साथ भेज दो। आदेश का तुरंत पालन हुआ। इसके बाद सबने छक कर आइसक्रीम खाई और मेरी शान में कसीदे भी गढ़े। खा-पीकर और अच्छी खातिरदारी कराकर मन तृप्‍त हो गया था।

अब तो सुस्ताने की इच्छा थी। साफा पहने मैं कोने में कुर्सियां तलाश रहा था। तभी वधु पक्ष वाले मिल गए। पूछा-खाना-वाना खा लिया, साहब। मैंने हामी भरते हुए सोने की जगह मांगी। उनके आदेश एक कमरे में गद्दा मिल गया और मैं रजाई ओढ़कर सो गया। सुबह सात बजे एक ठोकर से नींद खुली। कैटरिंग वाला बड़बड़ा खड़ा था- इतना पीना जरूरी था क्‍या। सारी बारात जा चुकी है और यह अब तक पड़ा है। मैंने कहा- जुबान संभाल कर बात कर। देखा नहीं मेरे पास साफा है। यह कहते हुए साफा ढ़ूंढ़ने लगा, लेकिन नहीं मिला। हालात बदल चुके थे। मैंने चुपचाप निकल लेने में ही भलाई समझी।

photo: सांकेतिक फोटो

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