गलती से Mistake नहीं Blunder हो गया
गलती से Mistake नहीं Blunder हो गया

गलती से Mistake नहीं Blunder हो गया

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लंबे अंतराल के बाद लाचारी में कुछ महीने पहले डॉक्‍टर के पास जाना पड़ा। गलती मेरी थी। जाना किसी और डॉक्‍टर के पास था, लेकिन तफरी के लिए पीएचसी में चला गया। वहां आयुर्वेद की डॉक्‍टरनी साहिबा का हाल देखकर तमाम डॉक्‍टरों की करतूतें चलचित्र की मानिंद आंखों के सामने घूम गईं। फलां अस्‍पताल मेंडॉक्‍टर ने पेट में कैंची, तौलिया, ग्‍लव्‍स आदि-इत्‍यादि छोड़ दिए। फलां डॉक्‍टर ने अमुक की खराब दांत छोड़ दी, अच्‍छी वाली निकाल दी। उफ्फ….

फिर भी पूरा वाकया सुना ही देता हूं…

doctor-patient-nukkadtimesमैं 12 बजे सो कर ही उठा। देखा तो मेरे एक वरिष्‍ठ सहकर्मी, जो बड़े भाई की तरह हैं,  की मिस्‍ड  कॉल पड़ी थी। कुछ मिनट पहले ही किया था। फोन को हमने मूक-बधिर (साइलेंट मोड) बना रखा था। तभी समझ गया आज तो डॉक्‍टर के पास जाना ही पड़ेगा। हालचाल से पहले वह यही पूछेंगे, डॉक्‍टर को दिखाया या नहीं। मैंने उन्‍हें फोन किया तो तकादा कर बैठे… क्‍या? डॉक्‍टर के पास गए? कब जाओगे? लिहाजा, मुंह पर पॉलिश मार कर तुरंत डॉक्‍टर को दिखाने निकल पड़ा। यक़ीन मानिए… हिम्‍मत जुटा कर क्‍लीनिक तक भी गया, लेकिन कुछ मरीजों को इंतज़ार करते देख अन्‍तर्मन ने एक सवाल दिमाग की ओर उछाल दिया। यहां तो बहुत समय लग जाएगा। दूसरी जगह चलो। आगे बढ़ा तो वहां डॉक्‍टर नदारद। अन्‍तर्मन की जैसे बांछें खिल गई! अरे ! यहां भी मामला एकदम लुल है… तब मन में एक विचार कौंधा। पीएचसी चलते हैं… आयुर्वेद या होम्‍योपैथ वाले डॉक्‍टर को ही दिखा लेते हैं। खोपचे वाले डॉक्‍टर की परख भी हो जाएगी, जहां आज तक इक्‍के-दुक्‍के मरीज़ ही मैंने देखे। बहरहाल मैं आयुर्वेद डॉक्‍टर के पास पहुंचा।

उस समय वह एक महिला को देख रही थी। मुझे बैठने को कहा। फिर एक मिनट में 64 साल एक मरीज़ को निपटाकर मुझे बुलाया। उसने धीमी आवाज़ में मुझसे पता पूछा, लेकिन मैं भकुआया हुआ था। मुझे लगा पेशा पूछा। पूरे ख़म से बोला- पत्रकार हूं। फिर उसने पूछा- उम्र कितनी है? दिमाग ऐसे सवालों का आदी नहीं है, इसलिए उम्र गिनने लगा। फिर बता दिया। इसमें 10-15 सेकें की देरी हो गई। डॉक्‍टरनी ने पूछा- स्‍मृति लोप की समस्‍या है क्‍या? मिजाज़ एकदम से भन्‍ना गया। किसी तरह ख़ुद पर कंट्रोल किया जो बड़ी मुश्किल से होता है। मन मसोसकर मैंने कहा- आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है… बात पूरी भी नहीं की थी कि वह बीच में ही बोल पड़ी, आंखों के डॉक्‍टर को दिखाइए। मन तो किया एक जमा ही दूं कान के नीचे। लगभग डांटते हुए मैंने कहा- पहले पूरी बात सुनिए। फिर ज्ञान दीजिएगा। उसने मेरे भकुआए चेहरे को देखा, लेकिन चुप रही। मैंने कहा- धुंधला दिखने के साथ गुस्‍सा भी बहुत आ रहा है। वह फिर बोल पड़ी- यह तो न्‍यूरोलॉजि�कल प्रॉब्‍लम है। मैंने गहरी सांस ली। सोचा कि कह ही दूं… तुम कहां फंस गई हो? एक बार फिर  कंट्रोल किया। कहा- पैरों में सूजन भी हो जा रही है। (निशान दिखाते हुए) बाईं आंख पर एक धब्‍बा सा बन रहा है। उसने कहा- यह तो स्किन की समस्‍या है। मैंने तत्‍काल सरकार को मन ही मन धन्‍यवाद किया… सही आदमी को सही जगह बैठाया है! अगर यह यहां से हिली और वीराने से आबादी में गई तो कसम से कुछ कर गुज़रेगी। मैंने उसके चेहरे को ध्‍यान से देखा। वह ज़ेहनी तौर पर कतई दुरुस्‍त नहीं थी। खै़र…मोहतरमा ने कहा- आप ब्राह्मी ले जाइए। मैं विस्मित नज़रों से उसे देखता रहा। फिर उसने कहा- यह ब्रेन टोनिंग के लिए है। इस ब्रह्मज्ञानी ने ब्राह्मी के विषय में कुछ बोलना चाहा, लेकिन खुद को रोकते हुए कहा- आप दवाई दे ही दीजिए। और करता भी क्‍या। दवाई लेकर घर आ गया।

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