गूगल नहीं होता तो मेरा पंखा नहीं लटकता
गूगल नहीं होता तो मेरा पंखा नहीं लटकता

गूगल नहीं होता तो मेरा पंखा नहीं लटकता

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। पहले मैं इस मुगालते में था कि बंगाली बाबा के पास सभी समस्‍याओं का समाधान है। लेकिन गलत। गूगल बाबा के आगे बंगाली बाबा की क्‍या औकात! जो कहीं नहीं मिलेगा, वह गूगल पर जरूर मिलेगा। पहले मैं खामख्‍वाह गूगल को गाली देता था कि अपने ज्ञान कोष में यह सच कम और झ्‍ाूठ ज्‍यादा समेटे हुए है। मैं कितना गलत था, इसका पता कल चल गया।

एक हफ्ते से पंखा चल नहीं रहा था। दूसरे कमरे से काम चल जा रहा था तो आलस्‍य के चलते पंखा अपनी ही जगह लटका हुआ था। दूसरे कमरे का पंखा ऐसे चलता है कि मानो किसी भी समय वह मुझ पर कूदने ही वाला है। अब जहां इस तरह का अज्ञात खौफ हो वहां कोई चैन की नींद कैसे सो सकता है? रविवार को सोचा कि बनवाने का झंझट कौन मोल ले, बेहतर है कि नया पंखा ही ले आया जाए। पंखा खरीद कर रख दिया, लेकिन खुशामदमों के बावजूद मिस्‍त्री पंखे की जगह मुझे ही लटका गया। कमबख्‍त नहीं आया तो मैंने भी ठान लिया कि अब खुद ही इसे लटकाऊंगा। अगले दिन सीढ़ी ले आया। पुराना पंखा उतार लिया। नये पंखे का ब्‍लेड लगाने बैठा तो तार और स्‍क्रू नहीं दिखा।

भागकर दुकानदार के पास गया। वह अपने काम में लगा हुआ था। मुझे देखकर मुस्‍कुराते हुए नमस्‍कार चमत्‍कार किया। मैंने छूटते ही कहा- अगर कोई वैर है तो बता दो। वह बड़ी विनम्रता से बोलो- नहीं भाई साब, ऐसा कुछ नहीं है। क्‍या बात हो गई? मैंने कहा- एक बार सोच लो। हो सकता है कोई हिसाब रह गया हो। कहने लगा- बात क्‍या हो गई? बताओ तो सही। मैंने कहा- पंखे का ब्‍लेड कैसे लगाऊं? उसमें स्‍क्रू तो है ही नहीं। वह चकरा गया! ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने बताने लगा कि क्‍या क्‍या था डिब्‍बे में। इसी दौरान मुझे ध्‍यान आया कि स्‍क्रू तो मोटर में ही लगा हुआ है। जब उसे बताया तो वह हंसने लगा। बोला- कैसा मिस्‍त्री पकड़ लाए जिसे मालूम ही नहीं कि स्‍क्रू कहां होता है पंखे का?

यह बता कर अपनी इज्‍जत नीलाम थोड़े ही न करानी थी कि वह महान मिस्‍त्री मैं ही हूं। खैर, तार लेकर घर आ गया और अपने उपक्रम में जुट गया। सबसे पहले पंखे का कनेक्‍शन देखने लगा। लेकिन यह क्‍या? पुराने पंखे में क्‍वायल से चार तार निकले हुए हैं और नए वाले में तीन! बड़ी मुश्किल हो गई अब तो। सोचा था कि नकल करके तार जोड़ कर पंखा लटका दूंगा। लेकिन यहां तो मामला ही एकदम से अलग है। सोचा कि मिस्‍त्री को बुला ही लूं। लेकिन मन ने कहा- तेरी कोई इज्‍जत है कि नहीं। जब वह आ ही नहीं रहा है तो क्‍यों उसके पीछे पड़ा है?

अचानक मेरे दिमाग की बत्‍ती जली। मैंने गूगल किया- Fan connection with capacitor— इसके बाद सर्किट देखा। लेकिन मन आशंकित ही रहा कि अगर कुछ उल्‍टा कनेक्‍शन हुआ तो पंखे का क्‍वायल ही जल जाएगा। दरअसल, गूगल पर एकबारगी तो भरोसा ही नहीं हुआ। इसलिए बार-बार संबंधित की-वर्ड्स गूगल करता रहा। आखिरकार विद्युत सर्किट समझ में आ गया तो जो तार लेकर आया था उसे जोड़कर पहले टेस्‍ट किया। तार प्‍लग में घुसेड़ा तो पंखा चल पड़ा। आत्‍मविश्‍वास लौटा तो करंट का डर भी खत्‍म हो गया। बिना मेन स्विच ऑफ किये नया पंखा लटका दिया अौर कनेक्‍शन भी जोड़ दिया।

अपनी इस महान उपलब्धि पर मैंने मिस्‍त्री को आधा दर्जन मानसिक गालियां दीं। मन ही मन बोला- साले मुझे जानते ही नहीं। बचपन से ये सब काम करता आया हूं। अपनी पीठ ठोकता हुआ मैंने रेगुलेटर और स्विच ऑन किया, लेकिन पंखा नहीं चला। यह देखकर मेरा confidence गुहियां के खेत में चला गया। सोचने लगा कि कनेक्‍शन गड़बड़ हो गया लगता है। अब दोबारा टेप हटाकर कनेक्‍शन जोड़ना पड़ेगा— confidence हिल चुका था और करंट लगने का पुराना डर भी दोबारा हावी हो चुका था। तभी अचानक विचार आया कि क्‍यों न पुराने पंखे की जांच की जाए। कहीं ऐसा तो नहीं कि बीच से कोई तार ही टूट गया हो या बोर्ड से कनेक्‍शन छूट गया हो।

लिहाजा इस आइन्टिन ने पुराने पंखे के तार को प्‍लग में घुसेड़ा तो वह चल पड़ा। तब सबसे पहले यही ख्‍याल आया कि पंखा तो ठीक है— लगता है रेगुलेटर ही खराब है। स्विचबोर्ड खोला और कनेक्‍शन डायरेक्‍ट कर दिया तो पंखा भनभना कर घूमने लगा। अब अफसोस हुआ कि बेकार ही 1500 खर्च कर दिया। इसी सोच में घूमते पंखे पर नजर डाली तो अहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ है। तभी नीचे दो कैनोपी पर निगाह पड़ गई। मैंने दूसरे पंखे को देखा तो माजरा समझ में आ गया कि उसमें क्‍या लगाना भूल गया। मन ही मन भुनभुनाया— अंकल पोजर वाली हालत हो गई है मेरी।

दोबारा उसे उतारा। दोनों ढक्‍कन लगाया और नए सिरे से पंखे को लटकाया। अब ठीक था। confidence अब लौट कर आ गया था। सोचा कि लगे हाथ दूसरे पंखे को उतार कर इस पंखे को उसकी जगह लगा देता हूं। लेकिन यह सोचकर रुक गया कि इस कोठी का अनाज उस कोठी में करने से क्‍या फायदा? घड़ी पर नजर डाली तो रात के दस बज चुके थे। मतलब पूरी कसरत में तीन घंटे निकल गए थे। मन ने एक सवाल दागा- एक आदमी एक काम को तीन घंटे में करता है। तीन काम करने में उसे कितने घंटे लगेंगे? जवाब दिमाग में आते ही पुराने पंखे को पोंछ कर कोने में रख दिया।

मैं तो यही सोच रहा था कि पंखा बनाने वाले ने एक कनेक्‍शन कम निकाला। यानी चार की जगह तीन ही कनेक्‍शन निकाले। धन्‍य हैं गूगल बाबा! मन में आया कि झापड़ मारने का तरीका गूगल बाबा सुझाते हैं कि नहीं? यह सोचकर मैंने गूगल किया- How to slap… भाई साब! गूगल बाबा के पास इसका भी जवाब था! वह भी विधिवत और तस्‍वीरों तथा यू-ट्यूब पर चलचित्र के साथ! उनकी इस विद्वता के आगे झ्‍ाुकने के अलावा मेरे पास कोई और चारा नहीं था।   गूगल बाबा को साष्‍टांग दंडवत कर मन ही मन बोला- बाबा, आप नहीं होते तो आज पंखा नहीं लटकता।

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2 Comments

  1. हा हा हा हा हा हा.
    दरअसल जिस पंखे से 4 तार निकले होते हैं बाहर से उनके 2 तारों को आपस में जोड़ दिया जाता है जिससे कि एक तरह से वो 3 तार वाला ही होता है. लेकिन 3 तार वाले पंखे में अन्दर से ही ये काम कर दिया गया होता है.

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