जि़द्दी भूत प्रेम से भी भागते हैं
जि़द्दी भूत प्रेम से भी भागते हैं

जि़द्दी भूत प्रेम से भी भागते हैं

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। शिवानी मेहता

हमारे टाइप के विलक्षण गुणों वाले प्राणी की गिनती इस पृथ्‍वी पर दुर्लभ या दुर्लभतम की श्रेणी में होती है। हमारे भीतर जि़द, ढिठाई, दिलेरी, जुनून और सनक जैसे महानतम गुण कूट-कूट कर भरे होते हैं। अब अपनी तारीफ़ खु़द क्‍या करूं? बस जी, अफ़सोस कहें या कसक …बाहर हम हर तरह के भूत भगाते, लेकिन घर में हमारा भूत एक ही शख्‍स भगाता – वह थी मां। मां एकल भूमिका में यानी जब सिर्फ मां होती है तो टोपी घुमाना आसान होता है। लेकिन जब वह डबल रोल में होती है तो कसम से जो होता है, उसे तो वही बयां कर सकता है जिसने दर्द झेला हो।

एक कहावत तो सुनी होगी- जाके पैर फटी बेवाई, वही समझे पीर पराई। दरअसल, हमारी माताजी शिक्षिका भी थीं। बस पूछिये मत। सारा दिन अपनी रेल बनी रहती थी। ऐसी हालत होती थी कि दिनभर यही बुदबुदाया करते थे कि भगवान कभी किसी को ऐसी मां न दे, अगर दे तो फिर वो उसकी टीचर न हो। यह खुफिया प्रार्थना इसलिए की जाती थी, क्‍योंकि हमारे भीतर मंगल ग्रह वाले जो सोलह गुण थे (कुछ तो ऊपर गिना चुकी हूं) उनमें एक यह भ्‍ाी था कि मैं दर्जा अव्‍वल निकम्‍मी थी। अब बच्‍चा निकम्‍मा वह भी शीर्ष श्रेणी में हो तो मां क्‍या कर सकती है? लिहाजा, मिजाजपुर्सी के लिए वह पढ़ाते समय एक डंडा रखती थीं। ढीठ तो हम भी कम नहीं थे और पिटना तो हमारे लिए खुराक या टॉनिक जैसा था। पाठ याद नहीं करते तो मां दम भर कूटतीं। हम भी ठाने बैठे रहते थे कि पीट लो, कितनी देर तक? कभी तो थकोगी ही। लेकिन कसम से वह मेरी मां ही थी… हमें ढोल की तरह बजाती अौर थक भी जाती तो पता नहीं चलने देती, उन्‍होंने कभी नहीं बख्‍शा।

टॉर्चर का आलम यह था कि वह सुबह हमें स्‍कूल में पढ़ातीं और शाम को घर पर ट्यूशन। अपने लिए बचने का कोई रास्‍ता नहीं छोड़ा गया था। मातेश्‍वरी हर समय खतरे की तरह सिर पर मंडराती रहती थीं। वह हर रोज स्‍कूल में होमवर्क देती अौर घर पर ट्यूशनवर्क- मतलब आगे गड्ढ़ा, पीछे खाई। न जी सकते थे और न मर सकते थे। हमारे निकम्‍मेपन को माताजी पहले ही ताड़ चुकी थीं। लिहाजा एक दिन ट्यूशन पर फरमान सुना दिया, पाठ कल याद हो जाना चाहिए और जो नहीं कर पाएगा उसे डंडे से सूता जाएगा। मां के धमकी भरे शब्‍द अभी कान के परदे से टकराए ही होंगे कि दिमाग ने अगले दिन की पटकथा पर आधारित एक लघु फिल्‍म ही आंखों के सामने रिलीज कर दी। हम जड़वत उस फिल्‍म को देखते रहे और कल्‍पना में ही हडि्डयों का संगीत सुनते रहे, क्‍योंकि अपुन तो आश्‍वस्‍त थे कि पाठ तो याद करने से रहे, तो परिणाम ही देख लें कि क्‍या क्‍या हो सकता है।

बस जी, तौबा तौबा करते अगला दिन आ गया। फिर दोपहर …वही ट्यूशन का टाइम। दिमाग की नसें तनी हुई थीं, इसलिए नहीं कि पाठ नहीं याद किया, बल्कि इसलिए कि डंडे से होने वाली सुताई से कैसे बचा जाए। तभी दिमाग में बिजली कौंधी। धांसू सा आइडिया अाया… डंडे को ही ठिकाने लगा दिया जाए। बिना खटपट किए दबे पांव मां के कमरे के पास पहुंची और चुपके से अंदर झांक कर देखा… मां सो रही थी। कलेजे को रूह अफ्जा जैसी ठंढक मिली। फिर दूसरे कमरे में गए जहां वह मरदूद डंडा पड़ा था। इसी के जोर पर माताजी ने हमें सुधारने का बीड़ा लिया था। हमने डंडा लिया और चुपचाप ऐसी जगह छिपा दिया जहां मां क्‍या… मां की मां भ्‍ाी नहीं ढूंढ़ पाती।

शाम हुई और ट्यूशन क्लास शुरू। मां रजिया सुल्तान की तरह अपने सिंहासन यानी कुर्सी पर विराजमान हुईं। हमारी हालत दरबार में सजा के लिए पेश अपराधी की तरह थी। आसन पर विराजमान होते ही माताजी पूछ बैठीं- हां भई, कल जो पाठ याद करने काे कहा था, वो सुनाओ। इधर, डर के मारे अपनी घिग्‍घी बंधी हुई थी। गले से लेकर नाभि तक सब सुन्न हो चुका था। हमारी सकपकाहट देखकर माताजी समझ गईं कि सबक याद नहीं किया है, अब इसे छठी का दूध याद कराना पड़ेगा। है। उन्‍होंने बुलंद आवाज में कहा- डंडा कहां है? ये बालक ऐसे नहीं सुधरने वाले। जब तक ठीक से पिटेंगे नहीं, इनकी पढ़ाई शुरू ही नहीं होगी। मेरे साथी बेहद उत्साहित थे कि आज फिर तरीके से हमारी सुताई होगी। इसलिए उनमें और दिनों की अपेक्षा कुछ ज्‍यादा ही फूर्ती दिख रही थी। कमबख्‍त भाग कर कमरे से डंडा लेने गए, लेकिन मिलता तब तो। हुआ भी वही… ढूंढ़-ढांढ़ कर बेचारे रुआंसे अंदाज में बैरंग लौट अाए।

डंडा नहीं मिला तो युद्धस्‍तर पर उसकी खोजबीन शुरू हुई। इस खोज अभियान में सबके पसीने छूट रहे थे, लेकिन हमारा मन तो जैसे सतरंगी झूले में हिलोरे ले रहा था। आखिरकार वही हुआ जो हम चाहते थे। डंडा नहीं मिला। हम डाल-डाल तो मां पात-पात। तंदूर जैसे गर्म तेवर को एकाएक ठंडा करते हुए शहद में लिपटे स्‍वर में बोलीं- … जो भी डंडा ढूंढ़ कर लाएगा, उसे अगले तीन दिन तक ट्यूशन से छुट्टी भी मिलेगी और कोई भी पाठ याद करने के लिए नहीं दिया जाएगा। पहले तो जैसे विश्वास ही न हुआ। यह तो जियो से भी बेहतरीन ऑफर था। एक बार फिर सब बच्‍चे दौड़ पड़े तो हमें भी जैसे बहती गंगा में हाथ का मौका मिल गया। पलक झपकते उसी जगह पहुंची, जहां डंडा छिपाया था और डंडा लेकर भागकर सीधे मां के सुपुर्द कर दिया। एकबारगी तो लगा कि जैसे मैंने अपनी मौत का सामान खुद ही लाकर मां के हाथ में थमा दिया है। लेकिन नतीजा हमारी सोच के उलट निकला। मां ने डंडे को बगल में रख दिया और बोलीं- तुम्हारी मासूमियत इस खुराफात पर भारी पड़ गई है। जाओ, आज छुट्टी करो। कल पाठ याद करके आना। आज के बाद यह डंडा इस ट्यूशन में नहीं दिखेगा। एक दिन बाद ट्यूशन का वक्‍त हुआ तो मेरी जिद थी कि याद किया हुआ पाठ सबसे पहले मैं सुनाऊंगी।

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