पहली बार रेलवे से दामाद का सुख मिला
पहली बार रेलवे से दामाद का सुख मिला

पहली बार रेलवे से दामाद का सुख मिला

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। आह! कोेलकाता से दिल्ली की उस यात्रा के क्या कहने। भुलाने से भी मन से उस पावन यात्रा का ख्याल नहीं जाता। ऐसा प्रतीत होता था जैसे ताजा-ताजा रेलवे का दामाद बना हूं। बरसों से ट्रेन में सफर कर रहा हूं, लेकिन ऐसी खातिरदारी और टीटीई का अपनापन पहली बार देखा और महसूस किया। वैसे भी नई-नई शादी के बाद दामाद की जमकर तिमारदारी की जाती है। बस एक कमी खली…ट्रेन में साले-सालियां नहीं थीं! ससुराल में दामाद को घेर कर रखने वाले लोगों का हुजूम भी नहीं था।

कुछ घंटे पहले तक कहां मुझे ट्रेन टिकट ही नहीं मिल रही थी। आखिरकार लालकिला एक्‍सप्रेस में टिकट मिल गई। ऑनलाइन सिर्फ दो ही टिकटें बची हुई थी, जैसे भारतीय रेल ने हम दोनों के लिए ही बचा कर रखा हुआ था। नदिया से हम हड़बड़ी में भागे आ रहे थे। टिकट की व्‍यवस्‍था हो जाने पर तसल्‍ली बख्‍श स्‍टेशन पहुंचे। हम उस प्‍लेटफॉर्म पर बैठे जहां से ट्रेन को रवाना होना था। लेकिन प्‍लेटफॉर्म पर गिने-चुने लोग ही थे। थोड़ी देर में ट्रेन आई और मुंह लटकाकर चुपचाप खड़ी हो गई।

यह वही ट्रेन थी जिसे पटना जाते हुए अक्‍सर किसी सुनसान ट्रैक पर खड़ा देखता था। उसमें बैठे लोग खि‍ड़कियों से कातर द‍ृष्टि से बाहर झांकते आने-जाने वाली ट्रेनों को निहारते रहते थे। तब मन में ख्‍याल आता था कि रेलवे विभाग इसे पूरे इत्‍मीनान और फुर्सत से चलाता है। इसमें सवार यात्रियों के धैर्य के तो क्‍या कहने! तब यही सोचता था कि राम बचाए ऐसी ट्रेनों से। मुझे क्‍या मालूम था किसी दिन मैं इसके पल्‍ले पड़ जाऊंगा! यह सब सोचकर मेरे जहन में भोजपुरी की एक लोकोक्ति घूमने लगी- पड़लन राम कुक्‍कुर के पाले…।

बहरहाल, हमने देखा बड़ी खामोशी और शालीनता से प्‍लेटफॉर्म पर आकर खड़ी हो गई। लेकिन इसमें किसी को चढ़ते नहीं देखा तो लगा कि इस नाम की कोई लोकल ट्रेन तो नहीं, क्‍योंकि भारतीय रेल की वेबसाइट के मुताबिक इसमें यात्रियों की रेलमपेल भीड़ होनी चाहिए थी। यह सोचकर कि रेलवे विभाग हमें इस प्‍लेटफॉर्म पर बैठा कर कहीं दूसरे प्‍लेटफाॅर्म से ट्रेन खोलने का षड्यंत्र तो नहीं रच रहा। एन्‍क्‍वायरी काउंटर के पास डिस्‍प्‍ले बोर्ड पर जाकर देखा तो ट्रेन का पता-ठिकाना वही था। लेकिन मन में एक खटका रह गया तो लगे हाथ हमने एक यात्री से पुष्टि की कि ये दिल्‍ली जाने वाली बैलगाड़ी एक्‍सप्रेस मतलब लालकिला एक्‍सप्रेस ही है न। उसने बांग्‍ला में कहा- हां, ये वही है।

जद्दोजहद से हमें स्‍लीपर का टिकट ही मिला था। हम ट्रेन में चढ़े, लेकिन एक बड़ी कमी खली। न किसी ने धक्‍का मारा, न किसी से बहस हुई। कोई विघ्‍न-व्‍यवधान नहीं हुआ। हम धड़धड़ाते हुए घुसे और अपनी सीट पर जाकर बैठ गए। वहां दो-तीन लड़के बैठे हुए थे। आगे से पीछे तक इस ट्रेन की जमा-पूंजी मुश्किल से करीब 200 लोग ही रहे होंगे। हर डिब्‍बे में यात्री मटर के 10-15 दाने की तरह पड़े हुए थे। ट्रेन चलने लगी तो भयंकर आवाज। जैसे किसी बड़े बर्तन या ड्रम में दो-चार पत्‍थर डालकर उसे घुमाने पर आवाज होती है, बस हमारी भी वही हालत थी। हम अपनी हालत पर हंस रहे थे। इतने में छिड़काव करता हुआ रेलवे का एक कर्मचारी आया। मैंने पूछा- क्‍या कर रहे हो? जवाब दिया- मच्‍छर मारने का स्‍प्रे। मैंने कहा- हम पर भी थोड़ा छिड़क दे… तो वह हंसता हुआ चला गया।

ट्रेन जब पूरी रफ्तार से दौड़ती तो कानफाड़ू शोर होता था। मेरे साथ जो मित्र थीं उन्‍होंने कहा कि यहां तो कान के परदे फट जाएंगे। इतनी शोर में सोएंगे कैसे। मैंने कहा- ट्रैक्‍टर का डाला (ट्रॉली) अगर खाली हो तो ज्‍यादा आवाज करती है, भर दो तो आवाज कम हो जाती है। समझ लो कि ट्रैक्‍टर में ही जा रहे हैं। लेकिन उन्‍होंने कहा कि एसी में देखिये शायद टिकट मिल जाए। डिब्‍बे में हम कुल पांच लोग ही थी। हमारे अलावा तीन और लड़के थे, जो बीच रस्‍ते में ही कहीं कूदने वाले थे। मैं जाने लगा तो लड़कों ने मजाक उड़ाया। कहा-भैया, क्‍यों पैसे बर्बाद कर रहे हैं। यहीं बैठिये…प्रकृति की शानदार हवा खाते खाते हुए चलते हैं। हमें अकेले छोड़कर क्‍यों जा रहे हैं। फिर भी मैं उठकर चला गया।

एकमात्र थर्ड एसी डिब्‍बे में घुसा तो पूरा खाली। टीटीई इत्‍मीनान से बैठा हुआ था। मुझे देखते ही उसकी बांछें खिल गई। झट से खड़ा हो गया। बोला- आइये सर। आपकी क्‍या सेवा करें? यह सुनकर कानों को बड़ा सुकून मिला। मन ही मन बोला- बस दो चार बार यही बोलता रह। झेंप मिटाते हुए मैंने कहा- सीट मिल जाएगी? उसने आगे से पीछे तक हाथ से इशारा करते हुए कहा- सर… पूरी ट्रेन आपकी है। आप सामान लेकर पहले आइये तो सही। चलने को हुआ तो अचानक परदे के पीछे से एक आदमी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा- सर प्‍लीज आ जाइये। कंपनी मिल जाएगी मुझे।

रेलवे कर्मचारी और इसमें सवार लोगों का इतना अपनापन…वाह! कोई हमें छोड़ने को राजी नहीं था। प्रेम की यह  अनुभूति विरले ही होती है। यह सब देखकर कोई कमबख्त क्यों नहीं अपने मन में दामाद होने की गलतफहमी पाल ले। याद कीजिए पहली बार ससुराल से विदाई देने कितने लोग आपको रेलवे स्टेशन छोड़ने आए थे? भाई साहब! हमें तो न कोई छोड़ने और न ही पकड़ने आया। लेकिन ट्रेन में बैठते ही इसने ऐसा पकड़ा कि पूरे छत्तीस घंटे बाद जब दिल्ली पहुंचे तब भी प्लेटफाॅर्म पर उतरने का मन नहीं बना। मन मसोसकर उतरना पड़ा। लाचारी में। मैं तो फिर भी ट्रेन में ही पसरा रहता, लेकिन मेरे साथ जो मोहतरमा थीं, उन्हें हवाई जहाज पकड़ने की जल्दी थी। मेरा जाॅली मूड में रहना और रेलवे से खातिरदारी कराना या रेलवे का दामाद बनना लगता है उन्हें फूटी आंख भी न सुहाया। सच मानिए! एयरपोर्ट जाते समय आधे रस्ते में मन किया कि इन्हें तुरंत विदाई देकर ट्रेन में पहुंच जाऊं।

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