महिला कोच में महिलाओं ने फर्श पर भी
महिला कोच में महिलाओं ने फर्श पर भी

महिला कोच में महिलाओं ने फर्श पर भी बैठने नहीं दिया

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। कुछ दिन पहले की बात है। मैं अपना एक जरूरी काम निपटा कर मुरादाबाद से बरेली जा रही थी। करीब पांच बजे स्टेशन से बरेली जाने वाली ट्रेन का टिकट लिया। सोचा जो ट्रेन आ जाएगी उससे ही बरेली चली जाऊंगी। टिकट लेने के बाद प्लेटफाॅर्म की तरफ मुड़ी ही थी, तभी अनाउंसमेंट हुआ कि लखनऊ से गोरखपुर जाने वाली ट्रेन वाया बरेली जाएगी। यह सुनते ही घर जाने की जल्दी में ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ लगा दी। सीढ़ियों के पास ही महिला कोच था। बस उसी कोच में चढ़ गर्इ। कोच तो महिलाओं का था मगर इसके दोनों दरवाजों पर और कोच के अंदर पुरुषों का अधिपत्य था। चढ़ने की भी जगह नहीं थी।

गेट पर लटक रहे लड़कों ने कहा, मैडम अंदर डिब्बे में जगह नहीं है। आप अगले डिब्बे में चढ़ जाएं। मैं उनकी बात अनसुनी करते हुए किसी तरह डिब्बे के अंदर दाखिल हुर्इ। देखा गेट पर लटक रहे लड़कों की पत्नियां अपने बच्चों के साथ सीट पर कब्जा जमाए हुए थीं। लड़कों की हिदायत का मतलब अब समझ में आ गया था। ट्रेन चलने में अभी थोड़ा वक्‍त था। एक तो गर्मी ऊपर से डिब्बे में भीड़-भाड़ देखकर सोचा उतर कर दूसरी ट्रेन पकड़ लूं। लेकिन इस ट्रेन को छोड़ देती तो घर पहुंचने में बहुत देर हो जाती। किसी तरह मन को मजबूत किया और डिब्बे में खड़ी हो गर्इ।

गर्मी की वजह से मैं पसीने से नहा रही थी। लोगों की अटैची और बैग ठुंसे हुए थे, जिसके कारण ठीक से खड़ा होने में भी मुश्किल हो रही थी। सामने की बर्थ पर बैठी महिलाओं से आग्रह किया कि मुझे बरेली तक ही जाना है, कृपया थोड़ी सी जगह दे दें। लेकिन उन्‍होंने मेरी बात को अनसुना कर दिया। दुबारा आग्रह किया तो तपाक से बोली- ‘आगे जाकर जगह तलाश लो। यहां जगह नहीं है।’ उसी बर्थ पर एक महिला अपने पांच बच्चों के साथ बैठी थी। बाकी दो अन्य महिलाएं छोटे बच्चे की दुहार्इ देकर बर्थ पर फैलकर बैठी हुई थीं और बच्चों को खिलाने में मशगूल थीं।

मैंने पांच बच्चों वाली महिला से आग्रह किया कि कुछ देर के लिए अपने किसी एक बच्चे को ऊपर की बर्थ पर बिठा दें। बरेली के बाद उसे नीचे बिठा लीजिएगा। मगर किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब तक ट्रेन चल चुकी थी। सभी महिलाएं शायद गोरखपुर जा रहीं थीं। कुछ पति अपनी पत्नियों के साथ सीट पर जमे हुए थे। मेरे पास एक अटैची पड़ी हुई थी। मैंने उसे हटाने के लिए कहा तो महिला का पति बरस पड़ा कि अटैची नहीं हटा सकता, तुम कहीं और जाकर खड़ी हो जाओ। फिर भी मैं खड़ी ही रही।

इस बीच सामने वाली बर्थ पर बैठी एक महिला अपने बच्चे को टाॅयलेट कराने चली गर्इ। दो मिनट के लिए मैं उसकी जगह पर बैठ गर्इ। मेरे पीछे ही एक और महिला भी उसी बर्थ पर बैठ गर्इ। हम दोनों ही काफी आराम से बैठे थे। इसी बीच महिला वापस आर्इ। सीट पर हम दोनों को बैठा देखकर आग बबूला होकर बोली- ‘हम कहि रहे हैं यहां से हटि जाओ हम र्इहां पर बैठे थे। तुम कहीं और जाकर बैठि जाओ।’ उस की बात सुनकर मेरे पीछे बैठी महिला खड़ी हो गर्इ। मैंने उससे कहा कि कुछ देर के लिए प्लीज ऐसे ही बैठ जाओ, मैं थोड़ी सी जगह में बैठी हूं। मगर उसने मेरी एक न सुनी और हाथापार्इ पर उतर आर्इ।

हटि जाओ यहां से हटि जाओ कहती हुर्इ उसने मुझे सीट से धक्का दे दिया। उसकी हरकत को देखते हुए मैं फर्श पर बैठ गर्इ। एक औरत की दूसरी औरत के प्रति इस तरह की संवदेनहीनता देखकर मुझे दुख कम हैरानी ज्‍यादा हुर्इ। मैंने सोचा कि कुछ देर बैठने के बाद खड़ी होकर बरेली तक चली जाऊंगी। मगर वह औरत तो संवेदनहीनता की सारी हद ही पार गई। उसने मुझे फर्श पर भी बैठने नहीं दिया, क्योंकि उसका बैग सीट के नीचे था जिसकी वजह से उसने मुझे वहां से भी हटने का अल्‍टीमेटम दे दिया।

वहां बैठी दूसरी महिलाएं भी उसका हौसला बढ़ा रही थीं। जब मैं नहीं हटी तो उसने अपने बच्‍चे को रुलाना शुरू कर दिया। फिर बोली- ‘देख ल्यो मैडम बचवा परेशान हो रहन, यहां से हटर्इ जाओ।’ महिलाओं के पति भी मुझसे उलझ गए। खैर, काफी देर बहसबाजी के बाद मुझे खड़ा होना पड़ा। खिड़कियों और दरवाजों तक पर कब्जा था, जिससे हवा भी अंदर नहीं आ रही थी। दम घुट रहा था। बेइंतहा गर्मी होने की वजह से मेरी तबियत बिगड़नी शुरू हो गर्इ। सिर दर्द तेज होने लगा। बैग में हमेशा कुछ इमरजेंसी दवाएं लेकर चलती हूं। बैग टटोला तो दवा नहीं थी। शायद घर पर ही भूल गर्इ थी। दर्द बढ़ता ही जा रहा था।

मेरी आंख से आंसू निकलना शुरू हो गए। दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था। सब मेरी तरफ देखने लगे। मगर उस डिब्बे में ऐसी एक भी महिला नहीं थी, जो यह कहती कि बैठ जाओ। तब लगा कि भगवान ने अपनों को शायद इसलिए बनाया है। तभी महसूस हुआ कि कोई मेरा सूट पकड़ कर खींच रहा है। देखा तो एक मासूम सी बच्ची अपने बैग की तरफ इशारा करके बोली- ‘दीदी आप यहां बैठ जाओ आपको दर्द हो रहा है।’ उसकी हमदर्दी देखकर एक पल को दर्द भी भूल गई। सोचा गाड़ी रामपुर रुक जाएगी तो मैं स्टेशन उतरकर दवा ले लूंगी और बस से चली जाऊंगी। मगर ट्रेन रामपुर नहीं रुकी।

सिर दर्द बढ़ता ही जा रहा था। इसी बीच गाड़ी एक अनजान जगह रुकी। मैंने डिब्बे से उतरकर गार्ड के डिब्बे का रुख किया। सोचा उसे मदद मागूंगी। गार्ड अपने डिब्बे में नहीं था। मगर उसने मुझे अपने डिब्बे में चढ़ता हुआ देख लिया था। वह गुस्से से मेरी तरफ बढ़ा और मेरे कुछ भी कहने से पहले उसने मुझे अपने डिब्बे से नीचे उतरने की हिदायत दे डाली। जिसे सुनकर मैं नीचे आ गर्इ। मैंने उससे पूरी बात बताना चाहा मगर उसके पास मेरी बात सुनने का समय नहीं था।

उसने कहा- ‘मैडम मैं कुछ सुन नहीं पाऊंगा। आप महिला कोच में बैठ जाएं।’ फिर भी बस किसी तरह मेरे मुंह से तबियत शब्द निकला जिसे वह सुन सका। उसने मुझे महिला कोच में बैठने का फरमान दे दिया। मैं महिला कोच में वापस चढ़ गर्इ। गार्ड भी मेरे पीछे महिला कोच में चढ़ा। वहां उसने कहना शुरू किया- ‘एक एक को डिब्बे से नीचे उतार दूंगा। मैडम को बैठने की जगह दो। मैडम की तबियत खराब है।’ फिर एक आदमी को उसने सीट से उठा दिया। वहां मुझे बैठने को कहा।

उस सीट पर बैठकर मैं बरेली तक पहुंची। एक मन किया कि जाकर रेलवे शिकायत पुसितका में महिला कोच का हाल बयां करूं। मगर मेरी तबियत खराब होने की वजह से मुझे सिर्फ घर नजर आ रहा था। एक एक पल भारी था। हैरानी दो बातों की थी – एक तो महिलाओं की संवेदनहीनता, दूसरा जहां महिलाओं की हिफाजत के कानून बनाते बनाते सरकार हांफ रही है, वहां आम जिंदगी में सुनने वाला भी कोर्इ नहीं है। मुझ जैसी न जाने कितनी महिलाओं को हर रोज ऐसे ही वाकये से दो-चार होना पड़ता होगा। अगर महिला कोच में सरकारी नियमों पालन हो रहा होता तो शायद मेरा सफर दर्द भरा न होता।

(सुचित्रा सिंह की फेसबुक वॉल से)

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