इसे कहते हैं धुन का पक्‍का होना
इसे कहते हैं धुन का पक्‍का होना

इसे कहते हैं धुन का पक्‍का होना

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स। बब्‍लू पांडे का असली नाम क्‍या है यह तो मुझे नहीं मालूम। यह भी नहीं जानता कि बब्‍लू पांडे करते क्‍या हैं। मैं तो उन्‍हें जानता भी नहीं, अगर कल (मंगलवार) को एक घटना घटी नहीं घ्‍ाटती।

हुआ यूं कि मैं घर में बोर हो रहा था। सोचा थोड़ा बाहर की हवा खा लूं। रात करीब साढ़े नौ बज मैं नीचे उतरा और सड़क की ओर चल पड़ा। बदरीनाथ मंदिर वाले पार्क के पास पहुंचा ही था कि लोगों की भीड़ दिखी। मैंने सोचा कि क्‍या बवाल हो गया है, जरा देखूं तो। नजदीक जाकर देखा तो कीचड़ में सना हुआ एक आदमी दीवार के सहारे पीठ टिका कर बैठा हुआ था। माजरा समझते देर नहीं लगी कि भाई साब किसी गटर में डुबकी लगाकर आए हैं। पत्रकार मन में तत्‍काल एक सवाल कौंधा- आखिर कहां? मैंने इधर-उधर निगाह दौड़ाई, लेकिन गटर की गुंजाइश कहीं दिखी नहीं।




अपनी जिज्ञासा कैसे शांत करूं? किससे पूछूं कि माजरा क्‍या है? तभी दो महिलाओं पर मेरी निगाह पड़ी। दोनों थोड़ी बदहवास सी लग रही थीं। पास ही एक लड़का शायद घटना की आंखोंदेखी बयां कर रहा था। मैं भी उनके पास जाकर खड़ा हो गया। दोनों महिलाओं में से एक बब्‍लू पांडे की बीवी थी, दूसरी मां और जो किस्‍सागोई कर रहा था वह पांडे जी का राजदार था।

दरअसल, पांडे जी बीते 15 दिनों से लापता थे। सिर्फ इतना कहकर निकले थे कि पार्टी के काम से यूपी जा रहा हूं। हड़बड़ी में फोन भी घर पर छोड़ गए थे। पांडे जी एक पार्टी के पेड वर्कर हैं। 500 किलोमीटर के दायरे में कहीं भी उनकी पार्टी की रैली होती है, बब्‍लू पांडे की दिहाड़ी पक्‍की रहती है। रोज 500 से 700 रुपये तो कहीं नहीं गए। ऊपर से अक्‍सर पिक एंड ड्रॉप सेवा भी मिल जाती है। कल भी बब्‍लू पांडे बनारस से पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ लौटे थे। रास्‍ते भर सब अपनी टंकी फुल करते आए थे।

गाड़ी पांडे जी को घर के पास उतार कर जा चुकी थी। पांडे जी इतना अधिक आचमन कर चुके थे कि दो पैरों पर चलना तो दूर, खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। किस्‍सागो ने बब्‍लू पांडे को देखा अौर उन्‍हें पकड़ कर घर ले जाने लगा। इतने में बब्‍लू पांडे का कोई स्विच अचानक ऑन हो गया और वह अपने मददगार की मां-बहन करने लग गए। इसके बाद हाथ छुड़ाकर सड़क किनारे भागे और छपाक से सीधे नाले में कूद गए। बेचारे किस्‍सागो ने ही पांच-छह लोगों को जुटाया और उन्‍हें बाहर निकाला। आसपास के लोगों की मदद से उनके जलाभिषेक का कार्यक्रम शुरू हो गया।




शुभचिंतक जितनी बार बब्‍लू पांडे पर बाल्‍टी से पानी डालते उनके क्रोध की ज्‍वाला और भड़क जाती। नशा काफूर होता जाता अौर वह चिल्‍लाते- अरे सालों…. मेरी सारी उतार दी। अब दोबारा पीना पड़ेगा। इतना कहकर सबकी अोर अंगुली दिखाकर उनकी मदर, सिस्‍टर एक करते और बेचारे शुभचिंतक कहते – पांडे जी, चुप हो जाओ। नहा-धोकर घर जाओ। भाभी और मां खड़ी है। इसके बाद बब्‍लू पांडे का गाली पुराण बीवी की ओर शिफ्‍ट हो जाता। दूसरे ही क्षण- “सालों ने उतार दी। दोबारा जाना पड़ेगा।” आचमन के प्रति उनकी लगन और निष्‍ठा देखकर मन यही बात आई— धून का पक्‍का होना इसी को कहते हैं।

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