मैं भैरव हूं
मैं भैरव हूं

मैं भैरव हूं

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

बात सितंबर 2009 के आखिरी सप्ताह की है। उन दिनों मैं पानीपत में एक हिन्‍दी अख़बार में काम करता था। मेरा निवास दफ्तर के पीछे सेक्टर-6 में था। नवरात्र का आखिरी दिन था। काम से निवृत्त होने के बाद करीब 2:30 बजे रात को मैं कमरे पर पहुंचा। इससे पहले कि दरवाजा खोलता, मेरे एक साथी की आवाज कानों में पड़ी। शायद किसी से उनका झगड़ा हो रहा था। उन्होंने मुझे आवाजा दी- बाबा ज़रा आना। (सहकर्मी मुझे इसी नाम से बुलाते हैं।) मैं भाग कर उनके पास पहुंचा। आवाज सुनकर मेरे अनुज जो घर जा रहे थे, वे भी आ धमके। झगड़ा शांत करा कर हम अपने-अपने घर को चले, लेकिन अनुज जि़द करने लगे कि बाबा हमारे साथ चलिए। अब तो नवरात्र भी खत्म हो गया। खाना हमारे साथ खाइए। ना-नुकुर के बाद मैं उनके साथ चल पड़ा। उनका कमरा इसी सेक्टर में था।

लगा जैसे कोई मेर ऊपर कूदा

रास्‍ते में मुझे लगा कि पेड़ों के झुरमुट में कोई है जो छिपने की कोशिश कर रहा है। मैंने कुछ पल के लिए रूक कर देखने की कोशिश भी की, लेकिन अंधेरे के कारण मुझे पता नहीं चला। थोड़ी देर बाद अब हमलोग कमरे में बैठे थे। अनुजों के साथ घंटा भर बिताने के बाद मैं अपने कमरे के लिए निकल पड़ा। अभी भोर के कोई चार बज रहे थे। उसी रास्ते से निकला, इस बार लगा जैसे पेड़ से कोई मेरे ऊपर कूदा। मुझे इसका अहसास हुआ, पूरा शरीर सिहर उठा। हालांकि डर जैसा कुछ अनुभव नहीं हुआ, लेकिन हृदय की गति सामान्य से अधिक जरूर थी। मैं कमरे पर पहुंचा तो थोड़ा भावुक हो गया।

मन के भाव अचानक बदलने लगे

फिर एक भावुक मैसेज मैंने अपने परिचित को भेज दिया जो रेकी हीलर थीं। मैंने लिखा- मां! मेरे लिए सादा भोजन बनाकर रखना, एक-दो दिन में आपके यहां आऊंगा और आपकी शिकायत दूर कर दूंगा। उनकी शिकायत थी कि मैं उनके यहां नहीं आने के बहाने ढ़ूंढ़ता हूं। मेसेज भेजने के बाद अचानक मुझे बहुत तेज गुस्सा आया। अब तक जिन्हें मैं मां कह कर संबोधित कर रहा था, अब मेरे मुंह से अनायास उनके लिए गालियां निकल रही थीं। आश्चर्य तो यह था कि जो बात उन्होंने मुझे बताई नहीं थी मैं उसे जानता था। अभी एक मिनट भी नहीं बीता था कि मेरा पारा और चढ़ गया। फिर मैंने एक मैसेज किया- एक मिनट के अंदर मुझे फोन कर नहीं तो तेरा सर्वनाश कर दूंगा। फिर मैंने उन्हें फोन कर दिया। उस समय सुबह के करीब 5 बज रहे थे।

– हरामजादी, मेरे बारे में सबकुछ पूछ लिया। अपने बारे में छिपाती है?
महिला- क्या हुआ अर्जुन?
– चुप! बीच में मत बोल। चुपचाप सुन।
महिला- हां… (थोड़ी घबराहट में), बोल… मैं सुन रही हूं।
– पहले बिस्तर से उठ। मुझे देख… दिख रहा हूं।
महिला- उठ गई। अब बता।…. नहीं, तू नहीं दिख रहा।
– सामने आ…थोड़ा और सामने। दरवाजे के पास खड़ी हो।
महिला- दरवाजे के पास आ गई…
– मैं दिख रहा हूं?
महिला- हां… तू चौकड़ी मार कर बैठा है।
– मुझे पहचाना?
महिला- नहीं… तू बता। तू कौन है?
– मैं भैरव हूं।

तीन साल बाद पता चला वो स्‍वामी समर्थ थे

इस तरह काफी देर तक मैं उस भद्र महिला को अनाप-शनाप बकता रहा। उस वक्त मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे कमरे में दो लोग मौजूद थे। एक बुजुर्गवार जो मुझे सोने के लिए कह रहे थे, दूसरा एक 30-32 साल का सामान्य कद काठी का एक युवक जो मुझसे थोड़ी दूर पर खड़ा था। मुझे उसका चेहरा आज भी याद है। हालांकि मैंने इन दोनों लोगों को नहीं देखा था। तीन साल बाद पता चला कि बुजुर्ग और नंग-धड़ंग दिखने वाले व्‍यक्ति स्‍वामी समर्थ महाराज यानी अक्‍कलकोट महाराज थे। उस समय मैं सर्वाइकल से जूझ रहा था। पेट के बल ही सोता था, क्‍योंकि करवट या पीठ के बल सोने पर पूरा हिस्‍सा सुन्‍न हो जाता था। लेकिन उस घटना के बाद मेरा दर्द पूरी तरह खत्‍म हो गया जिसे मैं छह महीने से झेल रहा था।

कोई शक्ति जैसे खींच रही थी

इसके बाद भी काफी कुछ बातें हमारे बीच हुई। आखिर में मैंने कहा- चल अब फोन रख… मेरे जाने का समय हो गया। सूर्योदय से पहले मुझे जाना है। इसके बाद मैंने फोन काट दिया। उस समय 6:10 बज रहे थे। एक अजीब बेचैनी और क्रोध था मेरे अंदर। ऐसा लग रहा था जैसे वह युवक मेरे पीछे-पीछे चल रहा है। मैंने सोने की कोशिश की, लेकिन सो नहीं सका। करीब तीन बजे जब दफ्तर पहुंचा तो रिसेप्शन से लेकर न्यूजरूम तक सभी मुझे देख रहे थे। उसी दिन अमित का जन्म दिन था। हम सभी कांफ्रेंस रूम में एकत्र हुए। केक कटा, लेकिन मेरे चेहरे से रौनक गायब थी। मुझे लग रहा था कि मेरा दम घुट जाएगा इतने लोगों के बीच। एक शक्ति मुझे वहां से बाहर ले जाने की कोशिश कर रही थी। चूंकि अमित मेरे बहुत अजीज हैं, इसलिए मैं चाहकर भी वहां से नहीं हट सका। क्रोध आ रहा था, लेकिन मैं बिल्कुल चुप था।

कोई निर्देश दे रहा था

करीब दस बजे पहला डाक एडिशन छोड़कर मैं बाहर निकला, लेकिन कदम खुद-ब-खुद सेक्टर की ओर मुड़ते चले गए। जहां तक याद है काम के वक्त आज तक मैं दफ्तर से इस तरह बाहर नहीं गया। कैंपस या ज्यादा से ज्यादा बाहर जीटी रोड के किनारे जरूर चला जाता था। जब मैं कॉलोनी की ओर जा रहा था मुझे अहसास हुआ जैसे कोई मुझे निर्देश दे रहा हो। इस बीच, जिनसे मैंने बदतमीजी की थी उनका मैसेज लगातार आ रहा था, अर्जुन तुम कैसा महसूस कर रहे हो? लेकिन मैं हर बार उन्हें यही कहता कि मैं भैरव हूं। बहरहाल मैं एक बार फिर अपनी सीट पर बैठ गया। अभी मैं बैठा ही था कि लगा जैसे कोई मुझे बुला रहा है।

आखिर कौन नचा रहा था

मैं क्रोध में तमतमाता हुआ बाहर निकला, लेकिन गेट के पास पहुंचकर सोचा.. अब बहुत हुआ… ये कौन है जो मुझे नचा रहा है? मुझे तो कोई शक्ति कमजोर बना ही नहीं सकती। इतना ठानने के बाद वापस न्यूजरूम में आकर काम में जुट गया। इसके बाद रात करीब 12 बजे मैंने हल्कापन महसूस किया। पर वह क्या था? मैं नहीं जान पाया। लेकिन मैंने जो झेला उसे मैं ही जानता हूं। ऐसा प्रतीत होता था जैसे दिमाग की नसें फट जाएंगी। मैं किसी भी पल पागल हो जाऊंगा।

(कहानी अपनी ब्‍लॉग से साभार)
http://kahaniapni-nagarjuna.blogspot.in/2014/10/2009-2008-17697.html

(सूचना: अगर आपके जीवन की भी ऐसी कोई मीठी, कड़वी, आश्‍चर्यजनक या चमत्‍कारिक घटना घटी है, स्‍कूल-कॉलेज, परिवार, दोस्‍तों के साथ या यात्रा के दौरान कोई रोचक घटना याद आती हो तो लिखकर हमें भेजें। तस्‍वीर के साथ संक्षिप्‍त जानकारी भी दें। हम उसे प्रकाशित करेंगे।)

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