... और मेरी धड़कन फिर से शुरू हो गई
... और मेरी धड़कन फिर से शुरू हो गई

… और मेरी धड़कन फिर से शुरू हो गई

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

बात उन दिनों की है जब मैं पहली बार मॉं बनी थी। उस समय मेरी उम्र 22 थी और मैं गर्भ से थी। नौवां महीना चल रहा था।

एक दिन की बात है। मेरे बड़े भैया ने नया घर बनाया था। गृह प्रवेश की पूजा हो रही थी। इसलिए घर में काफी चहल पहल थी। मेरा एक भतीजा था, जिसकी उम्र पॉंच साल थी। वह अक्‍सर मेरे साथ खेलने की जिद करता था। उस दिन भी उसने खेलने की जिद की। लेकिन मैंने मना कर दिया तो वह रूठ गया। मैं उसे मनाने की कोशिश करने गई तो वह सीढि़यों की तरफ भागा। मैं भी उसके पीछे-पीछे भागी। खेलने से इनकार के बाद छोटे मियॉं का गुस्‍सा सातवें आसमान पर था।

जब मैं सीढि़यों के पास उसे पकड़ने गई तो गुस्‍से उसने मुझे धक्‍का दे दिया। अचानक इस धक्‍के से मेरा संतुलन बिगड़ा और मैं लुढ़कती हुई नीचे जा पहुंची। घर में कोहराम मच गया। आनन-फानन में मुझे अस्‍पताल ले जाया गया। मुझे बस इतना याद था कि बच्‍चे ने मुझे धक्‍का दिया और मैं सीढि़यों से लुढ़की। इसके बाद मुझे होश नहीं रहा। जब होश आया तो मेरे पास रुई के फाहे जैसा एक प्‍यारा सा शिशु लेटा हुआ था।

मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था। ऐसा नहीं था कि मैंने कभी बच्चे देखे नहीं थे। मगर वह मेरा अंश था। कुछ दिन बाद जब अस्‍पताल से छुट्टी मिली और हम घर जाने की तैयारी करने लगे तो डॉक्‍टर ने कहा कि वह मुझसे और मेरे पति से बात करना चाहती हैं। हम उनके केबिन में गए। तब उन्‍होंने बताया कि हादसे की वजह मेरे पेट में अंदरूनी चोट लग गई थी। इसके कारण ऑपरेशन के दौरान मेरी धड़कन पूरी तरह बंद हो गई थी और उन्‍होंने मान लिया था कि मैं मर चुकी हूं। उसी समय जैसे कोई चमत्‍कार हुआ। अभी अभी जिस बच्‍चे को मैंने जन्‍म दिया था, वह रोया तो मेरे धड़कन फिर शुरू हो गई। डॉक्‍टर के लिए भी यह चमत्‍कार से कम नहीं था।

– ज्‍योत्‍सना मिश्रा

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