एक गलती ने ले ली 146 लोगों की जान
एक गलती ने ले ली 146 लोगों की जान

एक गलती ने ले ली 146 लोगों की जान

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स

नई दिल्ली, रजनी सिंह

पटना-इंदौर एक्सप्रेस कोई हादसा नहीं, बल्कि एक चूक थी। इस एक गलती ने 20 नवंबर को 146 से अधिक लोगों की जान ले ली। हालांकि रेल राज्‍य मंत्री मनोज सिन्‍हा दावा कर रहे हैं कि ट्रैक में दरार के कारण हादसा हुआ और 14 डिब्‍बे पटरी से उतर गए। लेकिन ट्रेन के चालक जलज शर्मा और सहायक चालक उमेश पुरोहित की मानें तो ट्रैक में गड़बड़ी के कारण दुर्घटना हुई। बताते चलें कि इस साल अब तक छह ट्रेन हादसे हो चुके हैं।

ट्रेन चालकों ने शुरुआती रिपोर्ट में कहा है कि ट्रेन की रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक थी। इसी बीच अचानक झटका लगा। चालकों को लगा कि कुछ गड़बड़ है। उन्‍होंने इमरजेंसी ब्रेक लगाई। लेकिन ट्रेन की रफ्तार अधिक थी इसलिए इसे रुकने में समय लगा, तब तक हादसा हो चुका था। ट्रेन के डिब्‍बे एक-दूसरे पर चढ़ गए थे। चालकों का कहना है कि अगर वे इमरजेंसी ब्रेक नहीं लगाते तो हालात और भयावह होते। वहीं, सूत्रों का कहना है कि ट्रैक की मरम्‍मत के दौरान लापरवाही बरती गई। यह पटना-इंदौर मार्ग मुख्‍य मार्ग न होकर बाइपास के तौर पर उत्‍तर भारत को दक्षिण से जोड़ता है। इसके कारण अल्ट्रासोनिक फॉल्‍ट डिटेक्‍शन (यूसफडी) मशीन से ट्रैक की नियमित और मैन्‍युअल जांच में लापरवाही हुई।

क्‍यों होते हैं हादसे

रेलवे में अभी भी ठेकेदारी प्रथा चल रही है। ट्रैक मरम्‍मत से लेकर इसे बदलने का ठेका उन्‍हीं के पास होता है। अधिकारियों का काम सिर्फ उसकी निगरानी करना होता है। इसके अलावा, तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण ट्रैक में दरार पड़ना, ट्रैक की खराब देखभाल, इसकी नियमित निगरानी नहीं होना, ट्रैक को जोड़ने का काम ठीक ढंग से नहीं होना, दरार पता लगाने के लिए ऑटोमैटिक क्रैक डिटेक्‍टर नहीं होना और प्रशिक्षित वेल्‍डर नहीं होने के कारण रेल हादसे होते हैं। रेल के पहियों की अलाइनमेंट, ढीले ब्रेक और पहियों में फ्रैक्‍चर के कारण भी दुर्घटना होती है।

यात्रियों की शिकायत की अनदेखी

मीडिया खबरों के मुताबिक, रेल अधिकारियों ने कथित तौर पर यात्रियों की शिकायत की अनदेखी की। यात्रियों का कहना था कि उन्‍हें एस-1 डिब्‍बे से असामान्‍य और विचित्र तरह की आवाजें निकल रही थीं। यह बात भी कही जा रही है कि करीब एक बजे चालक जलज शर्मा ने कथित तौर पर इंजन पर सामान्‍य से अधिक लोड की बात कही और झांसी डिविजन के अधिकारियों को इसकी सूचना दी।

पुराने डिब्‍बे भी बने वजह

ट्रेन के डिब्‍बे पुराने थे। यानी इसमें विंटेज आईसीएफ कोच लगे हुए थे। एलएचबी कोच अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं, क्‍योंकि इनमें डिस्‍क ब्रेक और झटके सहने की क्षमता होती है। एलएचबी कोच पटरी से उतरने के बावजूद अमूमन पलटते नहीं हैं। बढ़ती मांग के बावजूद एलबीएच बोगियों का उत्‍पादन बहुत धीमा है। इसलिए मात्र 10-15 फीसदी ट्रेनों में ही एलबीएच कोच लगाए जा सके हैं।

ट्रेनों में क्षमता से अधिक सवारी

हालांकि रेलवे दावा कर रहा है कि करीब 12,000 यात्री सफर कर रहे थे। लेकिन मीडिया खबरों में रेल अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि यात्रियों की तादाद इससे कहीं अधिक थी। इनमें अधिकांश बिना टिकट और कुछ अनअधिकृत टिकट पर सफर कर रहे थे। इसकी वजह यह है कि बिहार, उत्‍तर प्रदेश, भोपाल, इंदौर, झांसी और कानपुर के आसपास के लोगों के लिए यही एक सीधी ट्रेन है जो पटना से इंदौर को जाती है।

गड़बडि़यां और भी हैं

– रेलवे नेटवर्क पर बोझ बहुत अधिक है और यह तेजी से बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍था के समक्ष आने वाली नई चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं है।

– कुछ इलाके भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अभी भी रेलवे संपर्क से दूर हैं। इन इलाकों से असमानताएं दूर कर इन्‍हें रेलवे के लिए खोलने की जरूरत है।

– सड़क परिवहन से रेलवे को कड़ी टक्‍कर मिल रही है। इसलिए यात्री भी इससे मुंह मोड़ रहे हैं और माल ढुलाई भी कम हो रही है।

– रेलवे में नियमित पे रोल पर काम करने वाले कर्मचारियों की संख्‍या आवश्‍यकता से अधिक है। इससे भी रेलवे के विकास में बाधा आ रही है।

– राजनीतिक हस्‍तक्षेप और दबाव के कारण रेलवे को खर्चीली परियाजनाएं बनानी पड़ती हैं।

– रेलवे को डीजल और बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों की बड़ी रकम चुकानी पड़ती है।

– राज्‍य विद्युत बोर्डों और एनटीपीसी ने मनमाने ढंग से दरें बढ़ा दी हैं। इससे भी रेलवे पर बोझ बढ़ा है।

– रेलवे द्वारा उपयोग किए जाने वाले अधिकांश उपकरण अब जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं, जिन्‍हें तत्‍काल बदलने की जरूरत है।

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