इस कतार की कीमत ताे चुकानी होगी
इस कतार की कीमत ताे चुकानी होगी

इस कतार की कीमत ताे चुकानी होगी

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नुक्‍कड़ टाइम्‍स
नई दिल्‍ली। सच है कि दुनिया में भारत तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है। लेकिन एक सच यह भी है कि देश में उत्‍पादन क्षमता का पूरा इस्‍तेमाल नहीं होता है। अभी तक यह 70 फीसदी तक ही पहुचा है और हम अब भी सबसे गरीब देशों में शुमार हैं। ऊपर से बिना किसी तैयारी के 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने का फैसला गरीबी के सूचकांक में और कितने सितारे जड़ेगा यह तो आने वाला वक्‍त ही बताएगा।

नोटबंदी के कारण पूरा देश 9 नवंबर से बैंक और एटीएम के आगे कतार में खड़ा है। लोग काम धंधा छोड़कर घंटों तक कतार में खड़े रहते हैं। क्‍या यह आर्थिक प्रगति के लिए बड़ी चोट नहीं है? वह देश कैसे तरक्‍की कर सकता है, जहां की सरकार के लिए न श्रम शक्ति की कोई कीमत है और न ही समय की। इस फैसले के कारण निचले स्‍तर पर उत्‍पादकता बिल्‍कुल थम सी गई है।

सबसे ज्‍यादा मार उन लोगों पर पड़ी है जो मजदूरी करते हैं। कैश कारोबार करने वाले छोटे दुकानदार से लेकर मझोले व्‍यापारी तक सिर पीट रहे हैं। थोक व्‍यापारी के पास माल है, लेकिन उसकी जमा पूंजी बैंक में फंस गई है। दुकानदार के पास कैश नहीं है कि वह माल खरीद सके। खरीदार की लाचारी है कि उसकी जेब खाली है, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतें बहुत हैं।

पैसे के लिए मारामारी के बीच सरकार का यह कहना बड़ा हास्‍यास्‍पद है कि वह अनुमान ही नहीं लगा पाई कि नोटबंदी के फैसले से इस तरह की स्थिति पैदा हो जाएगी। इसलिए लोग 50 दिन तक थोपी गई मुसीबत को झेलें। इन दो महीनों में मौजूदा कतार व्‍यवस्‍था से देश को कितना आर्थिक नुकसान होगा, इसका जवाब कौन देगा।

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तीन साल लगेंगे उबरने में

इंस्ट्‌टीयूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट (चंडीगढ़) के अर्थशास्त्री डॉ. वीएस चौधरी के मुताबिक, मान लिया कि देश में एक व्‍यक्ति की औसत आय 300 रुपये प्रतिदिन है। काम के आठ घंटे होते हैं। यानी इस हिसाब से एक घंटे की उसकी कमाई 37.50 रुपये हुई। इस तरह से देखा जाए तो यदि 100 लोग लाइन में हैं तो हर घंटा 3750 रुपये का नुकसान हो रहा है। निश्चित ही अर्थव्यवस्था के लिए यह बडी़ चोट है। इससे उबरने में कम से कम तीन साल लगेंगे।

चीन से जबरदस्‍ती की तुलना

हम अक्‍सर अपनी तुलना चीन से करते हैं। लेकिन यह क्‍यों नहीं समझते कि 1960 में चीन की अर्थव्‍यवस्‍था हमसे छोटी थी, जो अब हमारे बाजार विनिमय दर के आकार का पांच गुना है। औसत चीनी नागरिक औसत भारतीय से चार गुना से ज्‍यादा धनी है। हम अभी भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में शुमार हैं। प्रति व्‍यक्ति आय के लिहाज से हम बेहद पिछड़े हुए हैं। बीते दो खराब मानसून के कारण कृषि क्षेत्र का विकास भी धीमा है, जबकि इस क्षेत्र में संभावनाएं जबरदस्‍त हैं।

कैसे निकालते हैं प्रति व्‍यक्ति आय

कुल सकल घरेलू उत्‍पाद यानी जीडीपी को देश की कुल आबादी से भाग देने पर जो शेष आएगा, वह प्रति व्‍यक्ति आय हुआ। चूंकि देश में औसत व्‍यक्ति की औसत आय एक समान नहीं है, इसलिए ऐसी स्थिति में प्रति व्‍यक्ति आय निकालना आसान काम नहीं है। मोटे तौर पर यह मान लें कि एक औसत भारतीय की आय देश की औसत आय से कम होती है। विश्‍व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, देश की शीर्ष 10 फीसदी आबादी के पास कुल आय का 30 फीसदी धन है। इसी वजह से प्रतिव्‍यक्ति आय बढ़ जाती है।

अगर भारत कहीं पहुंचना चाहता है तो आने वाले वर्षों में इसे मजबूत और सतत आर्थिक विकास की जरूरत है।  इसे हासिल करने के लिए करने से ज्‍यादा कहना आसान है।
– रघुराम राजन, पूर्व गवर्नर, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

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